Bhopal Gas Tragedy 1984: 3 और 4 दिसंबर 1984 के आधी रात को भोपाल के यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन फैक्ट्री में गैस त्रासदी के लगभग चार दशक हो रहे हैं परंतु, आम लोगों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का मुद्दा आज भी इस देश में किसी खजाने की तरह गड़ा पड़ा लगता है।
इसमें कोई विवाद नहीं है कि, वर्तमान में लोगों के रहन-सहन में काफी विस्तार और विकास हुआ है परंतु हमें यह भी समझना होगा कि आखिर किस तर्ज पर हमें यह विस्तार मिला है। क्योंकि आज तो लगभग सभी लोगों के लिए सुरक्षा व्यवसाय का एक जरिया बन गया है।
उदाहरण के लिए हवा खराब हो तो बड़ी कंपनियों के एयर क्लीनर ले लीजिए, घर में सफाई और हाइजीन बनाए रखने के लिए फ्लोर क्लीनर ले लीजिए और अगर पानी खराब लगे तो वाटर प्यूरीफायर घर में लगवा लीजिए। कहने का तात्पर्य है कि सुरक्षा के नाम पर कुछ भी बाजार में बेंच ले सब अच्छा ही मान लिया जाएगा और हिना ताक-झाक के खरीद लिया जाएगा।
भोपाल गैस त्रासदी(Bhopal Gas Tragedy 1984) से जुड़े महु्वपूर्ण तथ्य (संदर्भ नेटफ्लिक्स: द रेलवे मैन)
- इस गैस से होने वाली मुख्य समस्याओं में से जो मुख्य समस्याएं हैं वो आंखों का जलना, सांस लेने में दिक्कत, लीबर का फट के हाथ में आने जैसा महसूस होना शामिल है।
- जिस समय यह घटना घटित हुई उस समय फैक्ट्री का मेन अलार्म काफी समय घंटों तक बंद था।
- गैस के प्रभाव से भोपाल जंक्शन के सहायक स्टेशन मास्टर को मृत घोषित कर दिया गया था। वह घंटों तक शवगृह में पड़ रहे थे और उनके शरीर को जलाने से पहले वे जिंदा हो गए थे।
- राजकुमार केसवानी एक खोजी पत्रकार थे जिन्होंने गैस रिसाव की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। उन्होंने यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के कारखाने को फटने वाला ज्वालामुखी कहा था। 2021 में कोविड 19 महामारी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
- उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक गौरी शंकर झाँसी में निरीक्षण पर थे, जब उन्होंने भोपाल में हुई घटना के बारे में सुना। उन्होंने भोपाल जंक्शन से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे। वे उन लोगों की सहायता के लिए अपने स्पेशल ट्रेन से आगे बड़े थे परंतु उन्हें एक स्टेशन पहले ही रोक दिया गया था। पर वे अपने वरिष्ठों की इच्छा के विरुद्ध जाकर, निडर होकर भोपाल आये और लोगों की सेवा की।
- एक जर्मन विषविज्ञानी मैक्स डौंडरर सोडियम थायोसल्फेट की 50,000 शीशियों के साथ भोपाल पहुंचे, लेकिन उन्हें तुरंत दवा देकर शहर छोड़ने के लिए आदेश दिया गया।
- साजदा बानो ने 1981 में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में पिछले रिसाव में अपने पति को खो दिया था। 2 दिसंबर 1984 को, वह गोरखपुर एक्सप्रेस से भोपाल लौट रही थीं, एमआईसी ने उनके एक बच्चे को मार डाला और दूसरे को अपंग बना दिया।
- भोपाल गैस रिसाव में 15,000 से ज्यादा लोगों की जान चली गयी थी। रेलवे कर्मियों के साहस और वीरता के बिना यह संख्या बहुत अधिक होती।
- इस घटना के संदर्भों को लें और आज के संदंर्भ को देखें तो ऐसा ही महसूस होता हो कि सुरक्षा हर किसी का व्यवसाय है बस उसे उसके लिए मौका मिल जाए।
3 और 4 दिसंबर 1984 की भोपाल(Bhopal Gas Tragedy 1984) की वह काली रात जिसने देश की सबसे भीषण औद्योधिक दुर्घटना का जन्म दिया। उस रात पौंधो के लिए पेस्टीसाइड बनाने वाली केमिकल कंपनी यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के कारखाने में एमआईसी नामक जहरीले गैस का रिसाव होने से हजारों लोग हमेशा के लिए मौत की नींद में अपना जीवन खो दिया।
बेशक आठ घंटे के बाद भोपाल को इस गैस से मुक्त मान लिया गया हो लेकिन आज भी इसके जख्म को देखा जा सकता है। आज भी भोपाल त्रासदी के असर से वहाँ के लोगों में कई प्रकार की अपंगता देखने को मिलती है। परंतु दुखद इस बात का रहा कि हादसे के मुख्य जिम्मेदारों का सजा नहीं मिल सकी।
भोपाल गैस त्रासदी(Bhopal Gas Tragedy 1984) क्यों घटित हुआ?
- सुरक्षा को ताक पर रख कर भोपाल के घनी अबादी क्षेत्र में बनाया गया था यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन की पेस्टीसाइड फैक्ट्री।
- इस फैक्ट्री संयंत्र से कुछ ही मीटर की दूरी पर आम लोगों की बस्तियां बसी हुई थी।
- पेस्टीसाइड फैक्ट्री में कम कर्मचारियों का होना और सुरक्षा प्रक्रियाओं को ताक पर रख कर काम करवाया जा रहा था। जिसपर कई बार लोगों और ग्राउंड रिपोर्टर और खोजी पत्रकारिता करने वाले पत्रकार राजकुमार केसवानी ने आवाज़ उठाई थी पर सिस्टम के अंदर लालच और कारण वस इसे सिरे से नकार दिया गया था।
- सुरक्षा में लगाए गए लगभग सारे मैनुअल, अंग्रेज़ी भाषा में थे जबकि कारखाने में कार्य करने वाले ज़्यादातर कर्मचारियों को अंग्रेज़ी का बिलकुल ज्ञान नहीं था। इसी के साथ पाइप की सफाई करने वाले हवा के द्वार(वेन्ट) ने भी काम करना बन्द कर दिया था।
- सुरक्षा को ताक पर रखकर टैंक संख्या 690 में नियमित रूप से ज़्यादा एमआईसी गैस फिल करवा दिया गया था और जिसके चलते गैस का तापमान भी निर्धारित 4.5 डिग्री से 20 डिग्री पर पहुँच गया था। एमआइसी (मिथाइल आइसोसाइनेट) को कूलिंग स्तर पर रखने के लिए बनाया गया फ्रीजिंग प्लांट भी, पॉवर का बिल कम करने के लिए बंद कर दिया गया था।
भोपाल गैस त्रासदी(Bhopal Gas Tragedy 1984) का प्रभाव
गैस का रिसाव होने के कारण लोगों में अफरा-तफरी मच गई। इस अफरा- रफरी में लोगों की मौत और जल्दी होने लगी। क्योंकि यह गैस और जल्दी लोगों के लीबर में जाने लगा था। उस समय जो बंद कमरे में थे उन्हें भी इस गैस ने काफी नुकसान पहुँचाया था लेकिन फिर भी ये लोग बाहर जान बचाने के लिए भागने वालों से सुरक्षित थे।
उस समय ये देखकर अंदाजा लगा नहीं सकता था कि वह भारत के किसी शहर में हैं या कब्रीस्तान में हैं। जहाँ मरने वालों को अपने शरीर को दफनाने या जलाने का इंतेजार चल रहा है।
रात जैसे-जैसे गहरी होती गई भोपाल के अस्पतालों में भीड़ का झुंड बड़ता गया। वहाँ के डॉक्टरों को अचानक आई भीड़ और तबाही के बारे में पता ही नहीं था कि क्या चल रहा है। इस भीड़ के बीमारी के लिए उनके पास उस समय कोई दवा नहीं थी क्योंकि उन्हें बीमारी ही नहीं पता थी।
ऐसें में आंखों में जलन होने वालों के आंखों में आई ड्राप डाल रहे थे पर अन्य बीमारी के लिए उनके पास कोई दवा समझ में नहीं आ रही थी।
दो दिनों के अंदर ही भोपाल के अस्पतालों में 50 हजार से ज्यादा मरीज पहुँचे थे। तो कई की लाश सड़क पर ही पड़ी किसी का इंतेजार कर रही थी।
सरकार किसकी, क्या किया, बाद के सालों में इस मुद्दे पर क्या हुआ
जिस समय भोपाल में गैस त्रासदी(Bhopal Gas Tragedy 1984) हुई उस समय केंद्र और राज्य, दोनों ही स्थानों पर कांग्रेस की सरकार थी। उस समय प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी सत्ता को संभाल रहे थे तो वहीं भोपाल के मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुन सिंह अपना कारभार संभाल रहे थे। जब उन्हें गैस त्रासदी की बात पता चली तो उन्होंने भोपाल ले गुजरने वाली सारी ट्रेनों को या तो रद्द कर दिया या रूट डायवर्ट कर दिया।
परंतु भोपाल में केमिकल से घुट रहे लोगों के जान को लेकर यह बात कहकर परला झाड़ लिया कि उन्हें उस बिमारी के बारे में कुछ नहीं पता कि उससे बाहर के संसार को क्या खतरा हो सकता है। इसलिए जब तक रिपोर्ट उस मामले पर नहीं आ जाती है तब तक वे कुछ नहीं कर सकते हैं और न ही संबंधित विभाग को कुछ करने की इजाजत दे सकते हैं।
ऐसे में न तो गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदारों का न ही सजा मिली और न ही पीड़ितों का राहत महसूस कर सकने लायक न्याय या हर्जाना ही मिला। भोपाल की त्रासदी भोपाल के सियासत में मिलकर धूमिल हो गई और फिर एक समय ऐसा आया कि इसपर भी संदेह होने लगा कि यह घटना घटी भी या यह दिमाग का एक भ्रम है। बात कड़वी है पर सच है।
बाद में देंखे तो दो दशकों तक बीजेपी सरकार की तरफ से इस मुद्दे (Bhopal Gas Tragedy 1984) का चुनावी मुद्दे के रूप में प्रयोग किया गया। लेकिन इन दो दशकों के बाद धीरे-धीरे इस मुद्दे पर मिट्टी पड़ती गई। वहाँ के लोग खुद इस घटना को भूलते चले गए और अब हालत ये है कि लाखों लोगों के शहर में सव दो सव से ज्यादा लोग नहीं हैं जिन्हें इस बारे में कुछ जानकारी हो।
ऐसें में हम कह सकते हैं कि हमनें इससे सबक लिया और न ही हादसे को लेकर हमारे अंदर कोई गम ही रह गया है। तो ऐसे में बाहर वाले तो इन लूप होलों का लाभ उठाएं तो कोई हरज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के चार्जसीट में इस त्रासदी को लेकर 15,724 लोगों का मारे जाने की बात कही गई थी।
एंडरसन, मुआवजा, न्यायालय और रफूचक्कर
इस घटना के बाद यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन ने इस दुर्घटना में हुए छति के लिए उस समय 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर का मुआवजा दिया। परंतु यह मुआवजा क्षति हुए राशि से बहुत कम था। ऐसे में पीड़ितों ने ज्यादा मआवजे के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। नयायालय ने पीड़ितों की मांग को जायज ठहराया और यूसीसी के अध्यक्ष (CEO) को दोषी पाया।
6 दिसंबर 1984 को एंडरसन को गिरफ्तार कर लिया गया था। 07 जून को भोपाल की एक आदालत ने 7 अधिकारियों को हादसे के लिए दो साल की सजा सुनाई। UCC के अध्यक्ष वारेन एंडरसन जो कि इस मामले(Bhopal Gas Tragedy 1984) के मुख्य आरोपी थे, मुकदमें के लिए कोर्ट में पेश नहीं हुए। क्योंकि इस घटना के अगले दिन उन्हें भोपाल से प्राइवेट जेट के द्वारा दिल्ली गए और बाद में भारत सरकार के प्राइवेट जेट से उन्हें अमेरिका भेज दिया गया था।
1 फरवरी 1992 को भोपाल की कोर्ट ने फरार या कहें भगोड़ा घोषित कर दिया। एंडरसन के खिलाफ अदालत ने 1992 और 2009 में दो बार गैर-जमानती वारंट जारी किया परंतु एंडरसन की गिरफ्तारी नहीं हो सकी। एंडरसन की स्वाभाविक मौत 29 सितंबर 2014 को फ्लोरिडा के वीरो बीच पर 93 साल की उम्र में हुआ। Bhopal Gas Tragedy 1984 में गैस लीक होने के 8 घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैस से मुक्त मान लिया गया था लेकिन इसका जख़्म आज भी मौजूद है।
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