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एलोवेरा जिसे आयुर्वेद में घृतकुमारी और आम भाषा में ग्वारपाठा कहा जाता है, औषधीय पौधों की श्रेणी में सबसे लोकप्रिय है। इसकी उत्पत्ति उत्तर अफ्रीका से मानी जाती है, लेकिन आज यह पूरी दुनिया में उगाया जाता है। एलोवेरा के पत्तों में पाया जाने वाला जेल और रस कई औषधीय एवं सौंदर्य प्रसाधनों में काम आता है। यही वजह है कि इसकी खेती का व्यावसायिक महत्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।

एलोवेरा पौधे की संरचना

  • एलोवेरा के पौधे की ऊँचाई 60 से 90 सेंटीमीटर तक होती है।
  • पत्तियाँ मोटी, हरी और लंबाई में 30 से 45 सेंटीमीटर की होती हैं।
  • पत्तियों के किनारे छोटे-छोटे कांटे जैसे होते हैं।
  • एक स्वस्थ पौधे की पत्तियों का वजन 3 से 5 किलो तक हो सकता है।

एलोवेरा की कई प्रजातियाँ हैं, जो अलग-अलग रोगों और उपयोग के अनुसार पाई जाती हैं।

एलोवेरा का उपयोग

एलोवेरा में कई औषधीय और स्वास्थ्यवर्धक गुण पाए जाते हैं।

1. चिकित्सा में उपयोग

  • जलने और कटने पर इसकी जेल त्वचा पर लगाने से तुरंत आराम मिलता है।
  • पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में सहायक है।
  • त्वचा रोग और इम्युनिटी से जुड़ी समस्याओं के इलाज में भी उपयोगी।

2. सौंदर्य प्रसाधनों में

आज कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियाँ एलोवेरा को अपने उत्पादों में इस्तेमाल कर रही हैं।

  • फेसवॉश
  • क्रीम
  • शैम्पू
  • टूथपेस्ट
  • हर्बल दवाइयाँ

एलोवेरा की बढ़ती मांग ने इसे व्यावसायिक खेती की दिशा में और मजबूत बनाया है।

एलोवेरा की खेती के लिए मिट्टी और जलवायु

एलोवेरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी भी प्रकार की मिट्टी में आसानी से उग जाता है।

उपयुक्त मिट्टी

  • रेतीली दोमट मिट्टी सबसे बेहतर होती है।
  • जलभराव वाली मिट्टी में इसकी खेती नहीं करनी चाहिए।
  • बंजर और अनुपजाऊ जमीन पर भी यह आसानी से उग जाता है।

जलवायु

  • गर्म और शुष्क जलवायु एलोवेरा के लिए उपयुक्त है।
  • पाला (frost) से यह पौधा जल्दी खराब हो जाता है, इसलिए ठंडे इलाकों में इसकी खेती सावधानी से करनी चाहिए।

खेत की तैयारी

एलोवेरा की सफल खेती के लिए खेत की सही तैयारी आवश्यक है।

  1. खेत की कम से कम 2 बार गहरी जुताई करें।
  2. प्रति हेक्टेयर 10–20 टन गोबर की सड़ी हुई खाद डालें।
  3. इसके अलावा 120 किलो यूरिया, 150 किलो फॉस्फोरस और 30 किलो पोटाश मिलाएँ।
  4. मिट्टी को समतल बनाकर 50×50 सेंटीमीटर की दूरी पर क्यारियाँ बनाएं।

रोपाई और किस्में

  • एलोवेरा की रोपाई प्रकंदों (suckers) से की जाती है।
  • अच्छे परिणाम के लिए प्रकंद की लंबाई 10 से 15 सेमी होनी चाहिए।
  • पौधों की दूरी 50×50 सेंटीमीटर रखें और कतारों की दूरी 30 सेंटीमीटर रखें।

अनुशंसित किस्में

  • सिम-सितल एल-1
  • एल-2
  • एल-5
  • एल-49

इन किस्मों में जेल की मात्रा अधिक पाई जाती है।

सिंचाई प्रबंधन

एलोवेरा को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती।

  • सालभर में 4–5 बार सिंचाई पर्याप्त है।
  • गर्मियों में 25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
  • ड्रिप और स्प्रिंकलर विधि सबसे अच्छी मानी जाती है क्योंकि इससे पानी की बचत होती है और उत्पादन भी बढ़ता है।

निराई-गुड़ाई

खेत में खरपतवार नियंत्रण बहुत जरूरी है।

  • सालभर में 3 से 4 बार निराई करनी चाहिए।
  • निराई के बाद पौधों की जड़ों में मिट्टी चढ़ा दें, ताकि पौधे गिरें नहीं।

रोग और कीट नियंत्रण

एलोवेरा पर सामान्यत: कोई बड़ा रोग या कीट असर नहीं डालते।

प्रमुख रोग

  • तनों का सड़ना
  • पत्तियों पर धब्बे (फफूंदजनित रोग)

नियंत्रण

  • मेंन्कोजेब दवा 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

कटाई और उत्पादन

  • एलोवेरा की पहली कटाई रोपाई के एक साल बाद होती है।
  • कटाई करते समय सबसे नीचे की 3–4 पत्तियाँ काटी जाती हैं।
  • नई कोमल पत्तियों की कटाई नहीं करनी चाहिए।
  • एक हेक्टेयर खेत से 50–60 टन ताजी पत्तियाँ प्राप्त होती हैं।
  • दूसरे वर्ष उत्पादन में 15–20% की वृद्धि होती है।

बाजार मूल्य

  • बाजार में एलोवेरा की पत्तियाँ 3 से 6 रुपये प्रति किलो बिकती हैं।
  • एक स्वस्थ पौधे से 5 किलो तक पत्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं।

प्रसंस्करण और उत्पाद

कटाई के बाद पत्तियों को धोकर, ब्लेड से काटकर उनमें से निकलने वाले पीले गाढ़े रस को इकट्ठा किया जाता है।

  • इस रस को सुखाकर विभिन्न औषधीय रूपों में बदलते हैं।
  • अलग-अलग प्रसंस्करण विधियों से बने उत्पादों के नाम –
    • सकोत्रा
    • केप
    • जंजीवर
    • एलोज
    • अदनी

एलोवेरा की खेती के फायदे

  1. यह किसी भी प्रकार की जमीन में आसानी से उगाया जा सकता है।
  2. खेती का खर्च बहुत कम है।
  3. सिंचाई और दवाइयों पर अधिक खर्च नहीं आता।
  4. बंजर और अनुपयोगी भूमि का सदुपयोग होता है।
  5. पशु इस पौधे को नहीं खाते, इसलिए इसे खेत की मेड़ पर लगाना सुरक्षित रहता है।
  6. एक बार लगाने के बाद 4–5 साल तक फसल ली जा सकती है।
  7. अन्य फसलों की तुलना में मिट्टी की उर्वरता पर कम असर डालता है।

छोटे किसानों के लिए फायदे

  • कम पूंजी में अच्छी आय का साधन।
  • घरेलू उपयोग और बाजार दोनों के लिए लाभकारी।
  • आयुर्वेदिक और कॉस्मेटिक कंपनियों से सीधा कॉन्ट्रैक्ट कर सकते हैं।

निष्कर्ष

एलोवेरा की खेती कम लागत में ज्यादा लाभ देने वाली फसल है। इसकी बढ़ती मांग घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छोटे और बड़े दोनों किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बना सकती है। सही तकनीक और उचित देखभाल से एलोवेरा खेती आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन सकती है।

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