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अलसी (Linseed) एक प्रमुख तिलहन फसल है जिसका उपयोग तेल निकालने, पशु आहार, खाद और औषधीय प्रयोजनों में किया जाता है। अलसी के बीज में 40% से अधिक तेल पाया जाता है जो सेहत के लिए भी फायदेमंद है। इसकी खली (oil cake) का इस्तेमाल पशुओं के चारे और जैविक खाद के रूप में किया जाता है।

भारत अलसी उत्पादन में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्रफल वाला देश है और उत्पादन की दृष्टि से तीसरे स्थान पर आता है। प्रमुख अलसी उत्पादक राज्य हैं – मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान और उड़ीसा।

अलसी की बुवाई का समय

  • अलसी की खेती का सही समय अक्टूबर से नवंबर माह है।
  • यह फसल मुख्य रूप से रबी मौसम में बोई जाती है।

अलसी के लिए मौसम और जलवायु

  • अलसी को ठंडी और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है।
  • अंकुरण के लिए तापमान: 25-30 डिग्री सेंटीग्रेड उपयुक्त।
  • बीज बनने के समय तापमान: 15-20 डिग्री सेंटीग्रेड चाहिए।
  • अलसी के लिए वार्षिक वर्षा 50-55 सेमी तक आदर्श मानी जाती है।
  • नमी रहित और शुष्क वातावरण इस फसल के लिए आवश्यक है।

खेत की तैयारी

  • खेत भुरभुरा और खरपतवार रहित होना चाहिए।
  • अच्छी नमी संरक्षण के लिए खेत को 1-2 बार गहरी जुताई करें।
  • बीज छोटे और पतले होते हैं, इसलिए सूक्ष्म जुताई और समतल भूमि बेहतर रहती है।

बीज और खाद-उर्वरक की मात्रा

  • बीज की मात्रा: 20-25 किलो प्रति हेक्टेयर।
  • बीज बोने की गहराई: 2-3 सेमी।
  • खाद और उर्वरक:
    • गोबर की सड़ी खाद: 4-5 टन/हेक्टेयर।
    • असिंचित भूमि: 50 किलो नाइट्रोजन + 40 किलो फॉस्फोरस + 40 किलो पोटाश।
    • सिंचित भूमि: 100 किलो नाइट्रोजन + 60 किलो फॉस्फोरस + 40 किलो पोटाश।

सिंचाई प्रबंधन

  • अलसी की फसल अधिकतर असिंचित भूमि पर बोई जाती है।
  • सिंचाई उपलब्ध होने पर दो बार सिंचाई करना लाभकारी है:
    1. फूल आने पर।
    2. दाना बनने के समय।
  • इससे उपज में 20-25% तक वृद्धि होती है।

अलसी की प्रमुख किस्में और उत्पादन

सिंचित क्षेत्र की किस्में

  • प्रताप अलसी-2 → 20-22 क्विंटल/हेक्टेयर | अवधि 128-135 दिन।
  • जवाहर अलसी-23 → 15-18 क्विंटल/हेक्टेयर | अवधि 120-125 दिन।
  • सुयोग (JLS-27) → 15-20 क्विंटल/हेक्टेयर | अवधि 115-120 दिन।

असिंचित क्षेत्र की किस्में

  • JLS-66 → 12-13 क्विंटल/हेक्टेयर | अवधि 114 दिन।
  • जवाहर अलसी-9 → 11-13 क्विंटल/हेक्टेयर | अवधि 115-120 दिन।
  • इंदिरा अलसी-32 → 10-12 क्विंटल/हेक्टेयर | अवधि 100-105 दिन।

अलसी की प्रमुख बीमारियाँ और कीट नियंत्रण

1. फली मक्खी (Bud Fly)

  • नारंगी रंग की छोटी मक्खी।
  • नियंत्रण: इमिडाक्लोप्रिड 17SL (100 ml/हेक्टेयर) को 500-600 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें।

2. बालदार सुंडी

  • झुंड में रहकर पत्तियाँ खाती है।
  • नियंत्रण: मैलाथियान 5% डीपी 20-25 किलो/हेक्टेयर छिड़काव करें।

3. गालमिज

  • फसल की कलियों को नुकसान पहुँचाती है।
  • नियंत्रण: ऑक्सीडेमेटान मिथाइल 25% EC (1 ली/हेक्टेयर) या मोनोक्रोटोफास 36% SL का छिड़काव करें।

4. गेरुआ (Rust)

  • पत्तियों पर नारंगी रंग के धब्बे।
  • नियंत्रण: रोग की शुरुआत में फफूंदनाशक का छिड़काव।

5. भभूतिया रोग (Powdery Mildew)

  • पत्तियों पर सफेद चूर्ण जम जाता है।
  • प्रभावित दाने सिकुड़ जाते हैं।

6. उकठा (Wilt)

  • मिट्टी जनित रोग।
  • अंकुरण से पकने तक असर डाल सकता है।

अलसी की कम उत्पादकता के कारण

  • कम उपजाऊ और असिंचित भूमि पर खेती।
  • आधुनिक कृषि तकनीक का अभाव।
  • उच्च उत्पादक किस्मों की जानकारी न होना।
  • असंतुलित उर्वरक का प्रयोग।
  • खरपतवार और रोग नियंत्रण में लापरवाही।

खरपतवार नियंत्रण

  • अलसी की फसल में रबी मौसम के खरपतवार उगते हैं।
  • नियमित निराई-गुड़ाई करें।
  • उचित समय पर खाद और उर्वरक डालते रहें।

कटाई और मड़ाई

  • फसल पूरी तरह सूखने पर कटाई करें।
  • कटाई के बाद तुरंत मड़ाई करें ताकि बीजों का नुकसान न हो।
  • औसत उत्पादन: 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

निष्कर्ष

अलसी की खेती न केवल किसानों के लिए आय का अच्छा साधन है बल्कि इसका तेल, खली और उपोत्पाद स्वास्थ्य, पशुपालन और खाद उत्पादन के लिए भी उपयोगी हैं। उचित मिट्टी, खाद, सिंचाई और रोग नियंत्रण से किसान अलसी की अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं। भारत में अलसी की खेती का विस्तार बढ़ाकर किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।

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