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भारत में सामाजिक सोच अभी भी यह मानती है कि घर का काम महिलाओं की जिम्मेदारी है। खाना बनाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की सेवा – ये सब कार्य आज भी मुख्यतः महिलाओं के हिस्से ही आते हैं। चाहे वे कामकाजी हों या गृहिणी, इन कामों से उन्हें छुटकारा नहीं मिलता।

2019 के टाइम यूज सर्वे के अनुसार, शहरी क्षेत्रों की लगभग आधी महिलाएं एक दिन में एक बार भी घर से बाहर नहीं निकलतीं, क्योंकि वे घरेलू कामों में ही व्यस्त रहती हैं। यही नहीं, 52% से ज्यादा महिलाएं रोज़ाना 5 घंटे से अधिक समय घरेलू कामों में लगाती हैं, जबकि ऐसा करने वाले पुरुषों का प्रतिशत मात्र 1.5% है।

डबल बोझ: कामकाजी महिलाओं की दोहरी जिम्मेदारी

जो महिलाएं ऑफिस में काम करती हैं, उन्हें घर का पूरा बोझ भी उठाना पड़ता है। डेलॉयट की Women@Work रिपोर्ट बताती है कि सिर्फ 15% कामकाजी महिलाओं को ही उनके पार्टनर से घरेलू काम में बराबरी की मदद मिलती है, बाकी 85% महिलाएं डबल शिफ्ट में जीती हैं – दिन में ऑफिस और शाम-रात को घर।

इस दोहरे दबाव के कारण महिलाओं का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। रिपोर्ट के अनुसार, 53% महिलाओं को पिछले एक साल में तनाव या मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। कई बार तो उन्हें करियर छोड़ना भी पड़ता है, क्योंकि दोनों मोर्चों को एक साथ संभालना असंभव हो जाता है।

पुरुष मदद करना चाहते हैं, लेकिन कर नहीं पाते

मिंटेल की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 60% भारतीय पुरुष चाहते हैं कि वे घरेलू कामों में पत्नी की मदद करें। लेकिन उनकी सोच और व्यवहार में अंतर है। इसके कई कारण हैं:

  • घरेलू काम का अनुभव नहीं: 32% पुरुषों को लगता है कि घर का काम मुश्किल है, जबकि 34% सफाई से जुड़े उत्पादों के इस्तेमाल से डरते हैं।
  • सामाजिक सोच: 41% युवा पुरुष (25–31 वर्ष) मानते हैं कि घरेलू सामान महिलाओं के लिए है। इस सोच को विज्ञापन भी बढ़ावा देते हैं जहाँ अधिकतर महिलाओं को ही घरेलू उत्पादों का उपयोग करते दिखाया जाता है।
  • मजाक और शर्मिंदगी का डर: पुरुष जब घर के काम करते हैं तो उन्हें ‘मदद’ समझा जाता है, ‘जिम्मेदारी’ नहीं। अगर वे छुट्टी लें तो ऑफिस में मजाक उड़ाया जाता है। इससे पुरुष पीछे हट जाते हैं।

पूर्वोत्तर भारत में हालात बेहतर क्यों?

भारत के कई राज्यों में पुरुषों की भागीदारी बेहद कम है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत इसके अपवाद के रूप में सामने आया है। सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में 50% से ज्यादा शहरी पुरुष घरेलू कामों में भाग लेते हैं। वहाँ की समाजिक संरचना और संस्कृति में महिलाओं की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर है।

केरल भी एक सकारात्मक उदाहरण है, जहाँ 44% पुरुष घरेलू काम करते हैं। यह राज्य शिक्षा और सामाजिक चेतना में अग्रणी है। दूसरी ओर, बिहार (9%) और उत्तर प्रदेश (10%) में पुरुषों की भागीदारी बहुत कम है, जो पुरानी सोच और लिंगभेद का परिणाम है।

घर के काम की वजह से महिलाएं घरों में कैद

स्टडी के मुताबिक, 70% ऐसी महिलाएं जो न पढ़ती हैं न नौकरी करती हैं, दिन में एक बार भी घर से बाहर नहीं जातीं। इससे वे समाज से कट जाती हैं, आत्मविश्वास खो बैठती हैं और अवसरों से दूर हो जाती हैं। यही नहीं, लगातार काम करने और आराम न मिलने से उनकी सेहत भी खराब होती है।

ब्रांड और विज्ञापन भी ला सकते हैं बदलाव

मिंटेल रिपोर्ट कहती है कि ब्रांड्स की भूमिका समाज की सोच बदलने में अहम हो सकती है:

  • घरेलू काम को आसान दिखाना: जैसे कि सर्फ के विज्ञापन।
  • प्रोडक्ट प्रचार: वॉशिंग मशीन जैसी चीजें पुरुषों को भी लक्षित करें।
  • सेहत और फायदे दिखाना: बताएं कि घर के काम से शरीर सक्रिय रहता है।

इमोशनल अपील: घरेलू काम को “प्यार और देखभाल” के रूप में पेश करें।

सोशल मीडिया पर मजाक और उसका असर

कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान सोशल मीडिया पर घरेलू काम को लेकर कई मीम्स वायरल हुए। इनमें महिलाओं को काम करती और पुरुषों को आराम करते हुए दिखाया गया। यह ‘हास्य’ कहीं न कहीं समाज की असमान सोच को मजबूत करता है और बराबरी की दिशा में उठते कदमों को कमजोर करता है।

महिलाओं की तरक्की में रुकावट

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 61.4% महिलाएं मानती हैं कि परिवार और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी उनकी करियर ग्रोथ में बाधा बनती है। पुरुषों की कम भागीदारी और ऑफिस की सख्त कार्यप्रणाली महिलाओं की तरक्की को रोकती है।

बराबरी के लिए क्या ज़रूरी है?

समानता लाने के लिए सिर्फ महिलाओं को जागरूक करना काफी नहीं है। समाज, सरकार और कॉर्पोरेट जगत को मिलकर ये कदम उठाने चाहिए:

  • घरेलू काम के लिए पुरुषों को प्रोत्साहित करना
  • कार्यस्थलों पर लचीले घंटे और पितृत्व अवकाश देना
  • बच्चों की देखभाल सेवाओं में सरकारी निवेश
  • महिलाओं की सुरक्षा के लिए सार्वजनिक परिवहन सुधारना
  • जागरूकता अभियान चलाना कि घर का काम केवल महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं है

निष्कर्ष

भारत में महिलाएं सिर्फ नौकरी नहीं करतीं, वे घर भी संभालती हैं – बिना थके, बिना रुके। लेकिन अगर हम बराबरी की असली तस्वीर देखना चाहते हैं, तो हमें सोच बदलनी होगी। पुरुषों को घरेलू जिम्मेदारियों में भागीदार बनाना होगा। सरकार, ब्रांड्स और समाज — सभी को मिलकर आगे आना होगा, तभी महिलाओं को उनके हिस्से का समय, सम्मान और अवसर मिलेगा।

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