JATI JANGADNA

भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास को बेहतर तरीके से समझने के लिए जनगणना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इन दिनों मोदी सरकार द्वारा नई जनगणना कराने की घोषणा की गई है, जिसमें जाति जनगणना भी शामिल होगी। इससे पहले भारत में आखिरी पूर्ण जाति जनगणना वर्ष 1931 में हुई थी। वहीं, राज्यों में जाति सर्वेक्षण समय-समय पर किए जाते रहे हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि जाति जनगणना और जाति सर्वेक्षण के बीच क्या अंतर है, इनकी आवश्यकता क्यों है और हाल ही में किए गए राज्यों के जातीय सर्वेक्षणों के आंकड़े क्या कहते हैं।

जाति जनगणना क्या है?

जाति जनगणना, भारत सरकार द्वारा आयोजित राष्ट्रीय जनगणना का एक अभिन्न हिस्सा होती है। यह केंद्र सरकार की देखरेख में होती है, जिसके लिए सेंसस एक्ट-1948 जैसे कानूनी प्रावधान हैं। जाति जनगणना के आंकड़े अत्यंत गोपनीय होते हैं और केंद्र सरकार ही इनका उपयोग सामाजिक कल्याण योजनाओं और नीतिगत निर्णय लेने के लिए करती है।

जाति जनगणना में प्रत्येक नागरिक की जाति के आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं, जिससे विभिन्न जातियों के बीच जनसंख्या वितरण की स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। जाति आधारित आरक्षण और सामाजिक न्याय की योजनाओं के लिए ये आंकड़े बेहद जरूरी होते हैं।

जाति सर्वेक्षण क्या है?

जाति सर्वेक्षण या कास्ट सर्वे, राज्य सरकारों या स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा आयोजित किया जाता है। इसके आयोजन के लिए केंद्र की बजाय राज्य सरकार के निर्देश और नियम लागू होते हैं। ये सर्वेक्षण आमतौर पर सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वास्तविकता जानने के लिए आयोजित होते हैं। जाति सर्वेक्षण के आंकड़ों का प्रयोग राज्य सरकारें अपने स्तर पर सामाजिक और आर्थिक नीतियों को प्रभावी बनाने में करती हैं।

इस प्रकार, जाति सर्वेक्षण एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र (राज्य या जिला) के अंदर आयोजित होते हैं और इनके आंकड़े अक्सर सार्वजनिक होते हैं।

जाति जनगणना और जाति सर्वे के प्रमुख अंतर

जाति जनगणना और जाति सर्वे के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर इस प्रकार हैं:

कानूनी दर्जा

  • जाति जनगणना: केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत होती है, जिसका प्रावधान सेंसस एक्ट-1948 में किया गया है।
  • जाति सर्वेक्षण: राज्यों के अपने नियम-कानून के तहत होता है। इसका कोई केंद्रीय कानूनी आधार नहीं है।

दायरा

  • जाति जनगणना: राष्ट्रीय स्तर पर पूरे भारत की जनसंख्या को शामिल करती है।
  • जाति सर्वेक्षण: सीमित क्षेत्र में, जैसे एक राज्य या जिले तक सीमित होता है।

आंकड़ों की गोपनीयता

  • जाति जनगणना: आंकड़े गोपनीय और सुरक्षित रखे जाते हैं।
  • जाति सर्वेक्षण: आंकड़े राज्य सरकार की नीति और निर्देश के अनुसार सार्वजनिक किए जा सकते हैं।

हाल ही में राज्यों में हुए जाति सर्वेक्षण

भारत के कुछ राज्यों में हाल ही में हुए जाति सर्वेक्षण के परिणामों को नीचे विस्तार से दिया गया है।

बिहार का जातीय सर्वेक्षण (2023)

बिहार सरकार ने अक्टूबर 2023 में अपना जातीय सर्वेक्षण पूरा किया। इसमें राज्य की कुल जनसंख्या लगभग 13 करोड़ बताई गई। सर्वेक्षण में कुल 214 जातियां चिन्हित हुईं।

  • OBC (BC + EBC): राज्य की कुल आबादी का 63.14%
  • SC: 22 जातियां शामिल, कुल जनसंख्या का महत्वपूर्ण हिस्सा
  • ST: 32 जातियां शामिल
  • गरीब परिवार: राज्य में लगभग 94 लाख
  • शिक्षा स्तर: मात्र 6.47% लोग ग्रेजुएट हैं। इसमें सामान्य वर्ग के 14.54%, EBC में 4.44%, SC में 3.12% और ST में 3.53% स्नातक हैं।

कर्नाटक का जातीय सर्वेक्षण (2014)

कर्नाटक में 2014 में सिद्धारमैया सरकार ने सामाजिक और आर्थिक सर्वे कराया था। हालांकि, यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, पर मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार:

  • ओबीसी वर्ग की संख्या में बड़ी वृद्धि
  • प्रमुख समुदाय जैसे लिंगायत और वोक्कालिगा की संख्या में गिरावट
  • करीब 192 नई जातियां सामने आईं

इस सर्वे के बाद राज्य में फिर कोई जाति सर्वेक्षण नहीं कराया गया।

तेलंगाना का जातीय सर्वेक्षण (2025)

फरवरी 2025 में तेलंगाना ने अपना जातीय सर्वेक्षण कराया। इसमें राज्य की आबादी लगभग 3.70 करोड़ दर्ज की गई। इसके आंकड़े:

  • पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम अल्पसंख्यकों को छोड़कर): 46.25%
  • अनुसूचित जाति (SC): 17.43%
  • अनुसूचित जनजाति (ST): 10.45%
  • मुस्लिम पिछड़ा वर्ग: 10.08%
  • अन्य जातियां: 13.31%

जाति जनगणना और सर्वेक्षण की आवश्यकता

जाति जनगणना और सर्वेक्षण सामाजिक न्याय, आर्थिक योजनाओं और राजनीतिक निर्णयों के लिए बेहद जरूरी हैं। इनके माध्यम से:

  • आरक्षण नीतियों का न्यायपूर्ण क्रियान्वयन संभव होता है।
  • सरकारी योजनाओं के लाभ सही जरूरतमंद तक पहुंच सकते हैं।
  • समाज के पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है।
  • सामाजिक असमानताओं को दूर करने में मदद मिलती है।

निष्कर्ष

जाति जनगणना और जाति सर्वेक्षण दोनों ही भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। दोनों के उद्देश्यों और विधियों में स्पष्ट अंतर हैं। वर्तमान परिस्थितियों में मोदी सरकार द्वारा जाति जनगणना कराने की घोषणा एक बड़ा कदम है, जिससे आने वाले समय में समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान और समावेशी विकास में सहायता मिलेगी। साथ ही राज्यों द्वारा कराए गए जाति सर्वेक्षणों के आंकड़े भी राज्य सरकारों की नीतियों को बेहतर बनाने में उपयोगी साबित होंगे।

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