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Mahabharat: महाभारत के शांति पर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर को राजनीति समझाते हुए भीष्म ने अच्छा लीडर बनने के तरीकों के बारे में बताया है।

महाभारत(Mahabharat) में भीष्म ने उन नीतियों के बारे में बताया है जो किसी अच्छे राजा या लीडर को पता होनी चाहिए। इसमें भीष्म ने काम करने वाले लोगों की क्षमता और पद का ध्यान रखने के लिए कहा है। महाभारत (Mahabharat) के शांति पर्व में भीष्म ने बताया है कि किस तरह काम करने वाले लोगों की योग्यता और मर्यादा को ध्यान में रखकर पदोन्नति की जानी चाहिए।

महाभारत(Mahabharat) के शान्ति-पर्व का श्लोक, जिसमें भीष्म बोल रहे हैं

भीष्म उवाच( भीष्म कहते हैं)

एवं गुणयुतान्भृत्यान्स्वेस्वे स्थाने नराधिपः।

नियोजयति कृत्येषु स राज्यफलमश्नुते।।

न वा स्वस्थानमुत्क्रम्य प्रमाणमपि सत्कृतम्।

आरोप्य चापि स्वस्थानमुत्क्रम्यान्यत्प्रपद्यते।।

स्वजातिगुणसंपन्नाः स्वेषु धर्मेष्ववस्थिताः।

प्रकर्तव्या ह्यमात्यास्तु नास्थाने प्रक्रिया क्षमा।।

अनुरूपाणि कर्माणि भृत्येभ्यो यः प्रयच्छति।

स भृत्यगुणसंपन्नं राजा फलमुपाश्नुते।।

भीष्‍म कहते हैं, हे युधिष्ठिर! जो राजा गुणवान नौकरों या अपने नीचे काम करने वाले लोगों को अपने-अपने स्‍थान पर रखते हुए कामकाज में लगाता है, वह राज्‍य के यथार्थ फल का भागी होता है। यानी वही अच्छा लीडर होता है।

भीष्म कहते हैं कि पहले बताए हुए इतिहास से यह सिद्ध होता है कि कुत्ता अपने स्‍थान को छोड़कर ऊँचा चढ़ जाए तो न वह विश्‍वास के योग्‍य रह जाता है और न कभी उसका सत्‍कार ही होता है।

कुत्ते को उसकी जगह से उठाकर ऊँचा कदापि न बिठाएं; क्‍योंकि वह दूसरे किसी ऊंचे स्‍थान पर चढ़कर प्रमोद यानी आलस्य करने लगता है। इसी प्रकार किसी विशेष योग्यता से हीन मनुष्‍य को उसकी योग्‍यता और मर्यादा से ऊंचा स्‍थान मिल जाए तो वह अहंकार के कारण उछलने लग जाता है और मनमानी करने लगता है।

जो अपने कर्तव्य निभाने में सम्‍पन्‍न हो और अपनी जिम्मेदारी निभाने में लगे हुए रहे, ऐसे ही लोगों को मन्‍त्री बनाना फलकारी होता है।

भीष्म कहते हैं कि किसी को भी उसकी योग्‍यता से बाहर के काम नहीं देने चाहिए। जो राजा अपने सेवकों को उनकी योग्‍यता के अनुरुप काम सौपता है, वह कर्मचारियों के गुणों से सम्‍पन्‍न हो उत्तम फल का भागी होता है।

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By Admin

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