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आज़ादी के 100 वर्ष: हां, आप सोच सकते हैं कि मैं कैसी मूर्खता भरी बातें करने जा रहा हूं। जब पूरा देश आज़ादी के 75 वर्ष (AMRIT MAHOTSAV) पूरे होने पर आज़ादी का अमृत महोत्सव( AMRIT MAHOTSAV) मना रहा है तो ये 75वें साल को 100 साल क्यों कह रहा है। दरअसल यहां 2022 के स्वतंत्रता दिवस की बात कर ही नहीं रहा मैं आज आपको, आज से 25 साल आगे ले जाना चाहता हूँ।

सोचिए जब देश अपनी आजादी के 75वें वर्ष(AMRIT MAHOTSAV) को इतने जोश के साथ मना रहा है तो वह, अपने सौवें साल को किस तरह मना रहा होगा? आज आपको उसी सुबह के काल्पनिक चित्र का आभास इस पोस्ट के माध्यम से कराने का कोशिश करने जा रहा हूँ। (AMRIT MAHOTSAV)

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आज़ादी के 100 वर्ष

14 अगस्त 2047 का सूरज जब डूबेगा और एक नए सूरज के आने का पक्के तौर पर ऐलान हो जाएगा। जब पड़ोसी देश अपने सौवें साल का जश्न मना कर थक चुका होगा। इधर पूरा देश अपनी तैयारियों में लगा होगा स्कूलों और कॉलेज में आज़ादी के नाटकों का मंच तैयार हो चुका होगा, लाल किला थोड़ा और लाल हो चुका होगा, देश की सड़कें जगह जगह तीन रंगों में लिपटी हुई होगी|

देश का हर चौराहे पर ध्वज सजा होगा, नई संसद भवन दुल्हन की तरह, तिरंगे की रोशनी की चाशनी में डूबी होगी, एक झंडा लाल किले पर खुद को लहर-वाने के लिए बेताब होगा और इसी बीच एक नया सूरज सीना ताने निकलेगा और भारत में एक नई सुबह आएगी। वह सुबह जो 100 साल बाद आती है। इसी सुबह का तो इंतज़ार था।

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सौवां साल किसके लिए विशेष नहीं होता। एक मनुष्य के लिए, एक घटना के लिए, एक कंपनी के लिए या एक देश के लिए। जवाब है सब के लिए। भारत के लिए भी वह सौवां साल विशेष होगा। अति-विशेष। भारत अपनी उत्पत्ति का सौवां साल नहीं मना रहा होगा। ना ही भारत अपने अस्तित्व का सौवां साल मना रहा होगा। वह सौवां साल होगा भारत के बलिदान का, शौर्य का, अभिमान का। वह सौवां साल भारत के पूर्ण जन्म की यात्रा का। वह सौवां साल होगा आज़ाद भारतियों का। और वह सौवां साल होगा किसी के अलग हो जाने के दुख का भी।

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उस रोज सिर्फ देश की आज़ादी का सौ साल नहीं होगा। देश के संघर्ष का भी 100 साल होगा, उस रोज भगत सिंह, उधम सिंह, असफाक़-उल्लाह जैसे हर क्रांतिकारियों के बलिदान का भी सौ साल होगा। उस रोज गांधी के अनशन का सौ साल होगा। उस दिन नेहरू, पटेल, बोस जैसे हर आंदोलनकारियों के संघर्ष भी सौ साल होगा। उस रोज सौ साल होगा भारत के भारत होने का।

और फिर उस नए सवेरे में लाल किले से देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराएंगे। कितना भावुक क्षण होगा। जो भी उस वक्त वहां मौजूद होगा उसकी आँखे नम होगी मगर छाती फूल के चौड़ा होगा। यही तो है वो तीन रंगों वाला कपड़ा जो पूरे नस नस में उबाल भर देता है। इसी को देख के तो जीते हैं सब यहां। इसी की शान बरकरार रखने के लिए तो लाखों तपती रेत पर डिगे है तो लाखों बर्फीली पहाड़ियों पर अटल है। इसी के लिए तो जंगे लड़ी है हमने। कोई माई का लाल इसकी तरफ देखे तो उसकी रूह नोंच ले हम।

ये हमारा तिरंगा है। हमारे पुरखों की सबसे खूबसूरत विरासत।
विजय विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा इसी के लिए तो गाते है।

स्कूलों और कॉलेजों में झंडा फहराने के बाद आज़ादी का जश्न मनाया जा रहा होगा। जश्न में शामिल हर भारतियों में एक भारत होगा। पूरी दिल्ली मानो सन 1947 की प्रिंसली गार्डन होगी। देश के हर कोने से ज़ोर ज़ोर से ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ ‘भारत भाग्य विधाता’ की आवाज़ आ रही होगी मानो जैसे स्टेडियम में समूची भीड़ एक साथ “सचिन सचिन” चिल्ला रही है।

यही तो था “आईडिया ऑफ इंडिया”। यही तो है “इंडिया दैट इज भारत”। इसी रोज की तो कल्पना की गई थी 15 अगस्त 1947 की रात को। इसी दिन के लिए नेहरू ने कहा था : “ए मोमेंट कम्स व्हिच कम्स बट रेयरली इन हिस्ट्री वेन वी स्टेप आउट फ्रॉम द ओल्ड टू द न्यू”।

100 साल का भारत कितना परिपक्व होगा। हमारी शाख और भी प्रबल होगी। हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पक्के तौर पर सदस्य होंगे। हमारे पास एक्सप्रेस-वे का जाल होगा। कुछ एक बुलेट ट्रेन भी सरपट दौड़ रही होंगी। इसरो (ISRO) और भी ज्यादा प्रभावशाली होगा, कुछ भारतीय फिल्में भी ऑस्कर अवार्ड जीत चुकी होगी। मगर तब भी क्या सब कुछ ठीक हो गया होगा!!

क्या जातिवाद की गहरी और मजबूत जड़े कमज़ोर हो चुकी होगी, क्या धार्मिक दंगे, रेप , शोषण व भ्रष्टाचार जैसे तमाम अपराध खत्म हो चुके होंगे! नहीं! इस बारे में आशावादी नहीं हूँ। क्या तब तक हर भारतीयों के पास अपना घर होगा, क्या उस रोज़ कोई भूखे नहीं सोएगा…… ये नहीं कहा जा सकता ये तब और अब की सरकारों की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है।

मगर फिर भी तमाम चुनौतियों और संघर्ष से लड़ता हुआ एक प्रबल और ताकतवर देश भारत रहेगा। जितना आज है उससे ज्यादा भारत। मेरा भारत। आपका भारत। सेक्युलर सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक रिपब्लिक इंडिया

यूनान मिस्र रोमा
सब मिट चुके यहां से
अब तक मगर है बाकी
नामों निशां हमारा
सारे जहां से अच्छा
हिंदुस्ता हमारा
अब बुलबुले है इसकी
ये गुलिस्तां हमारा

नाम – मोहम्मद शादान अयाज़ (भागलपुर, बिहार)
जामिया में टी. वी. पत्रकारिता के छात्र


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