CJI VS ANIRUDDHACHRYA

हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सोशल मीडिया और धार्मिक हलकों में काफी सुर्खियाँ बटोरीं। यह विवाद जुड़ा है सुप्रीम कोर्ट, भगवान विष्णु की क्षतिग्रस्त मूर्ति और कथावाचक अनिरुद्धाचार्य से। मामला सिर्फ एक याचिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका और संत समाज के बीच बहस का विषय बन गया।

जावरी मंदिर और याचिका

मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर, जो विश्व धरोहर स्थल का हिस्सा है, वहाँ भगवान विष्णु की एक प्राचीन मूर्ति क्षतिग्रस्त हो गई थी। इसके पुनर्निर्माण और पुनर्स्थापना को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि मूर्ति को उसी स्थान पर पूर्ववत रूप से स्थापित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और CJI की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने कथित तौर पर टिप्पणी की—
“Go and ask the deity itself to do something now।”
यानी कि अब आप खुद देवी–देवता से पूछ लीजिए कि वे इस बारे में क्या कर सकते हैं।

यह टिप्पणी कोर्ट की कार्यवाही का हिस्सा थी, लेकिन जैसे ही बाहर आई, इस पर विवाद शुरू हो गया। कई लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताया।

CJI की सफाई

जब आलोचनाएँ बढ़ीं तो मुख्य न्यायाधीश ने सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनके शब्दों को तोड़–मरोड़कर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत किया गया। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं और सभी धर्मों का सम्मान करते हैं।

अनिरुद्धाचार्य का विवादित बयान

इसी बीच कथावाचक अनिरुद्धाचार्य, इस मामले में कूद पड़े। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले और खासकर CJI की टिप्पणी पर अपने प्रवचन के दौरान विवादित टिप्पणी कर दी। उनके इशारे सीधे–सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश की ओर माने गए। जैसे ही उनका वीडियो सामने आया, मामला और गरमा गया।

धर्म और न्यायपालिका का टकराव

इस पूरे प्रकरण ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि धर्म और न्यायपालिका जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बोलते समय कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। एक ओर न्यायपालिका यह कह रही है कि उसका फैसला कानूनी और धरोहर संरक्षण के आधार पर है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक नेता और श्रद्धालु इसे आस्था से जुड़ा मामला मान रहे हैं।

निष्कर्ष

कह सकते हैं कि यह विवाद केवल एक मूर्ति या एक बयान का नहीं है, बल्कि इसमें भारत की आस्था, परंपरा और न्यायपालिका की गरिमा का मुद्दा भी शामिल है। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद और तूल पकड़ता है या शांत हो जाता है।

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