भारतीय स्त्रियों के आभूषणों की सूची में नथ (Nath) या नथनी का एक विशेष स्थान है। यह न केवल सौंदर्य बढ़ाने वाला एक आभूषण है, बल्कि यह स्त्री की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। विशेषकर विवाह संस्कारों में नथ का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों में नथ की शैली, उसका आकार और पहनने की परंपरा भी भिन्न होती है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती है।
नथ का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
भारत में नथ पहनने की परंपरा प्राचीन काल से रही है। ऐतिहासिक चित्रों, मंदिरों की मूर्तियों और साहित्यिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। नथ को एक शुभ संकेत माना जाता है और यह विवाहिता स्त्रियों की पहचान रही है। कई क्षेत्रों में यह स्त्री की कुशलता, गरिमा और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा माना जाता है।
विवाह में नथ का विशेष स्थान
भारतीय विवाहों में नथ का विशेष महत्व होता है। विवाह के दिन जब दुल्हन नथ पहनती है, तो वह न केवल उसकी सजावट का हिस्सा होता है, बल्कि यह एक परंपरागत आशीर्वाद के रूप में भी देखा जाता है। नथ का आकार और डिज़ाइन इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस क्षेत्र की है। कई बार यह नथ कुल परंपरा से जुड़ी होती है और पीढ़ियों से विरासत में दी जाती है।
भारत के विभिन्न राज्यों में नथ पहनने की परंपराएं
उत्तर भारत: राजपूताना, उत्तर प्रदेश और पंजाब
राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भारी और गोलाकार नथें प्रचलित हैं। राजपूत महिलाएं अक्सर मोती और सोने से जड़ी बड़ी नथ पहनती हैं, जिसे “बड़ी नथ” कहा जाता है। पंजाब में ‘लाट कान वाली नथ’ प्रचलित है, जिसमें एक चेन होती है जो बालों या कान से जुड़ी होती है।
महाराष्ट्र: नथ का पारंपरिक वैभव
महाराष्ट्रीयन नथ, जिसे ‘ब्राह्मणी नथ’ भी कहा जाता है, खासकर शादी और गणेश उत्सव में पहनी जाती है। यह आमतौर पर मोती, माणिक और कुंदन से बनी होती है और इसका आकार चंद्राकार होता है। इसे पहनने की परंपरा पेशवाओं के समय से चली आ रही है।
बंगाल और ओड़िशा
बंगाली महिलाएं आमतौर पर छोटी गोल नथ पहनती हैं जिसे ‘नथुनी’ कहते हैं। यह सादगी और गरिमा का प्रतीक मानी जाती है। ओड़िशा में नथ को पारंपरिक शादी की पोशाक का हिस्सा माना जाता है।
दक्षिण भारत: परंपरा में सौंदर्य
तमिलनाडु और कर्नाटक की महिलाएं नथ को ‘मुक्कुथी’ के नाम से जानती हैं। यहां की नथें आमतौर पर नथुनी की तरह छोटी होती हैं और यह नाक के एक छेद में पहनी जाती है। केरल की नायर और अन्य जातियों में भी नथ पहनने की परंपरा विवाह में देखी जाती है।
उत्तर पूर्व और आदिवासी परंपराएं
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे मणिपुर, मेघालय और नागालैंड की कुछ जनजातियों में भी नथ या नाक से जुड़े आभूषणों का उपयोग होता है, जो सांस्कृतिक विशिष्टता का प्रतीक हैं। कुछ आदिवासी समुदायों में नथ को सामाजिक दर्जे से जोड़ा जाता है।
धार्मिक और आयुर्वेदिक मान्यताएं
कुछ आयुर्वेदिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नाक में छेद करवाना स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे महिलाओं को मासिक धर्म और प्रसव के समय कम पीड़ा होती है। साथ ही, नथ पहनना कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने वाला भी माना गया है।
आधुनिक युग में नथ का पुनर्जागरण
हाल के वर्षों में नथ को केवल पारंपरिक पहनावे तक सीमित नहीं रखा गया है। फैशन जगत में नथ को आधुनिक डिज़ाइन के साथ एक फ्यूज़न लुक में प्रस्तुत किया गया है। बॉलीवुड अभिनेत्रियों से लेकर फैशन शो तक में नथ एक ट्रेंडी एक्सेसरी के रूप में उभरी है।
नथ: परंपरा, पहचान और सौंदर्य का संगम
नथ भारतीय स्त्री की परंपरा, संस्कृति और पहचान का प्रतीक है। यह गहना सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक और भावनात्मक विरासत है। भारत की विविधता को जिस सुंदरता से यह आभूषण दर्शाता है, वह इसे विशेष बनाता है।
निष्कर्ष
भारत में नथ का महत्व केवल बाहरी सजावट तक सीमित नहीं है। यह एक आंतरिक सांस्कृतिक जुड़ाव, पारिवारिक परंपरा और सामाजिक पहचान का प्रतीक है। हर राज्य, हर परंपरा और हर विवाह के साथ इसकी शैली बदलती है, लेकिन इसका मूल भाव एक ही रहता है — सौंदर्य के साथ संस्कृति का संगम।
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