कृषि केवल भोजन उत्पादन तक सीमित नहीं है; यह जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन से भी गहरे रूप में जुड़ी हुई है। परंपरागत कृषि पद्धतियों में कई ऐसे उपाय होते हैं जो ग्रीनहाउस गैसों (GHG) के उत्सर्जन में योगदान करते हैं। वहीं, नई टिकाऊ कृषि प्रणालियाँ इस उत्सर्जन को नियंत्रित करने में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं।
कृषि आधारित कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत
कृषि क्षेत्र से उत्पन्न होने वाले कार्बन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के प्रमुख स्रोत हैं:
- रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग
- धान की खेती से निकलने वाला मीथेन गैस
- पशुपालन से निकलने वाला नाइट्रस ऑक्साइड और मीथेन
- पराली जलाना
- जैव विविधता की क्षति और भूमि का अत्यधिक दोहन
इन सभी स्रोतों से वैश्विक GHG उत्सर्जन का लगभग 10-12% हिस्सा आता है।
समाधान: कृषि में नवाचार और टिकाऊ प्रथाएं
1. जैविक और प्राकृतिक खेती
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर गोबर खाद, वर्मी कंपोस्ट, नीम तेल आदि का प्रयोग करने से भूमि की उर्वरता बनी रहती है और कार्बन उत्सर्जन में गिरावट आती है।
2. कवर क्रॉपिंग और फसल चक्र
कवर फसलें मिट्टी में कार्बन संचित करती हैं और मिट्टी कटाव को रोकती हैं। साथ ही, फसल चक्र परिवर्तन से भूमि में संतुलन बना रहता है।
3. सटीक सिंचाई और ड्रिप तकनीक
जल और ऊर्जा की बचत करते हुए यह तकनीक भूमि में जल भराव और मीथेन उत्सर्जन को कम करती है।
4. पराली प्रबंधन और बायो-चार उत्पादन
पराली जलाने के बजाय उसका उपयोग बायो-चार (Biochar) बनाने में करना मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है और कार्बन को दीर्घकाल तक बांधकर रखता है।
कार्बन क्रेडिट और किसानों के लिए अवसर
कई देश अब किसानों को कार्बन उत्सर्जन घटाने के बदले Carbon Credits देते हैं, जिसे वे कंपनियों को बेचकर आर्थिक लाभ कमा सकते हैं। भारत में भी ऐसी पहलें शुरू हो रही हैं, जहाँ किसान “Low-Carbon Agriculture” की ओर बढ़ते हुए आमदनी बढ़ा सकते हैं।
सरकारी योजनाएं और अंतरराष्ट्रीय पहल
- पर्यावरण संरक्षण हेतु राष्ट्रीय मिशन
- जलवायु अनुकूल कृषि हेतु NICRA (ICAR)
- FAO, UNDP जैसी संस्थाएं भी जागरूकता बढ़ा रही हैं
निष्कर्ष: हर खेत बने कार्बन सिंक
कृषि आधारित कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए सामूहिक प्रयासों की ज़रूरत है — सरकार, किसान, वैज्ञानिक और उपभोक्ता सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। टिकाऊ कृषि न केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद है, बल्कि यह किसानों की आय और जीवनशैली में भी सकारात्मक बदलाव ला सकती है।
आइए, ऐसी खेती को अपनाएं जो पोषण भी दे और प्रकृति का संरक्षण भी करे।
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