mallikaarjun jyotirling

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग: शिवपुराण के अनुसार 12 ज्योतिर्लिंगों में से दूसरा ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन है। यह आंध्र प्रदेश के श्रीशैल पर्वत पर स्थित है और इसे श्रीशैलम भी कहा जाता है। यह स्थान कृष्णा नदी के तट पर स्थित है और इसे “दक्षिण का कैलाश” भी कहा जाता है। यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के कुर्नूल के पास स्थित है, जो हैदराबाद से लगभग 250 किलोमीटर की दूरी पर है।

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का धार्मिक महत्व

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का हिंदू धर्म में अत्यंत धार्मिक महत्व है। यह मंदिर 18 महाशक्तिपीठों में से एक है और इन्हीं में से 4 विशेष शक्तिपीठों को सबसे अधिक पवित्र माना जाता है, जिनमें से एक श्रीशैलम है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पर्वत पर भगवान शिव की पूजा करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। अगर कोई व्यक्ति इस पर्वत के दर्शन करता है और भगवान शिव की पूजा करता है, तो उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं और उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

मल्लिकार्जुन नाम का महत्व

शिवपुराण के “कोटिरुद्रसंहिता” में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। “मल्लिका” का अर्थ माता पार्वती है और “अर्जुन” का अर्थ भगवान शिव है। जब इन दोनों शब्दों को मिलाते हैं तो यह “मल्लिकार्जुन” नाम बनता है, जो शिव और पार्वती का संयुक्त रूप है।

मल्लिकार्जुन से जुड़ी पौराणिक कथा

इस ज्योतिर्लिंग से जुड़ी एक पौराणिक कथा है, जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश और कार्तिकेय के विवाह को लेकर विवाद होता है। दोनों पुत्र विवाह के लिए झगड़ने लगे और इसके समाधान के लिए अपने माता-पिता के पास पहुँचे। माता पार्वती ने कहा कि जो भी पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा, उसका विवाह पहले होगा।

कार्तिकेय ने तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा शुरू कर दी, लेकिन गणेश जी का शरीर मोटा था और उनका वाहन चूहा था, जिससे उन्हें इतनी जल्दी पृथ्वी की परिक्रमा करना मुश्किल था। गणेश जी बुद्धिमान थे, उन्होंने माता-पिता को एक स्थान पर बैठने को कहा और उनकी सात बार परिक्रमा की। शास्त्रों के अनुसार, माता-पिता की परिक्रमा करना पृथ्वी की परिक्रमा के समान माना जाता है, जिससे गणेश जी ने यह प्रतियोगिता जीत ली।

माता-पिता की इस पूजा से शिव और पार्वती प्रसन्न हुए और गणेश जी का विवाह करा दिया गया। जब कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा कर वापस लौटे और गणेश का विवाह होता देख उन्होंने स्वयं को अपमानित महसूस किया। वे क्रोधित होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए।

जब शिव और पार्वती को इस बात का पता चला, तो उन्होंने कार्तिकेय को मनाने के लिए नारद मुनि को भेजा, लेकिन कार्तिकेय नहीं माने। माता-पिता के पुत्र स्नेह से वे स्वयं कार्तिकेय को मनाने के लिए क्रौंच पर्वत पहुँचे। लेकिन कार्तिकेय पहले से ही 12 कोस (36 किलोमीटर) दूर चले गए थे। तभी शिव जी वहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए, और तब से वह स्थान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

श्रीशैलम का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

श्रीशैलम पर्वत का महत्व केवल ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थान वर्षों से सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ के पर्वतों और जंगलों में स्थित मल्लिकार्जुन मंदिर, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। इस पवित्र स्थल पर सालभर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

श्रीशैलम को “दक्षिण का कैलाश” कहा जाता है, क्योंकि यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना की जाती है, जो कैलाश पर्वत के शासक माने जाते हैं। यहाँ भगवान शिव का एक रूप ज्योतिर्लिंग के रूप में और माता पार्वती का एक रूप शक्ति के रूप में विद्यमान है।

मल्लिकार्जुन मंदिर का वास्तुकला

मल्लिकार्जुन मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारत की विशेष शैली में निर्मित है, जिसे द्रविड़ शैली कहा जाता है। मंदिर का गोपुरम (प्रवेश द्वार) बहुत ही भव्य और ऊँचा है, जो दूर से ही दिखाई देता है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हैं, और मंदिर के अन्य हिस्सों में देवी पार्वती की भ्रामराम्बा के रूप में पूजा होती है।

मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर अनेक मंडप और पूजा स्थल बने हुए हैं, जहाँ श्रद्धालु भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। यहाँ की मूर्तियाँ और नक्काशी द्रविड़ कला के अद्भुत उदाहरण हैं, जो दक्षिण भारतीय मंदिरों की शिल्पकला को दर्शाती हैं।

श्रीशैलम का प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन

श्रीशैलम का क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यह क्षेत्र पहाड़ों, जंगलों और नदियों से घिरा हुआ है। कृष्णा नदी यहाँ के मुख्य आकर्षणों में से एक है, जो इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य को और भी अद्वितीय बनाती है। नदी पर स्थित संगम का दृश्य अत्यंत मनोहारी है और यहाँ आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को एक दिव्य अनुभव प्रदान करता है।

श्रीशैलम के आसपास का क्षेत्र भी पर्यटन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यहाँ कई अन्य दर्शनीय स्थल जैसे कि साक्षी गणपति मंदिर, फूलों की गुफा, पताला गंगा (जो कृष्णा नदी का एक नाम है), और श्रीशैलम बांध स्थित हैं। ये स्थल यहाँ आने वाले यात्रियों के लिए आध्यात्मिक और प्राकृतिक अनुभव का अनूठा संगम प्रस्तुत करते हैं।

श्रीशैलम का शक्तिपीठ और अन्य धार्मिक महत्व

यह स्थान न केवल ज्योतिर्लिंग के लिए, बल्कि शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि इसी स्थान पर माता सती की ग्रीवा गिरी थी, इसलिए इसे भ्रामराम्बा शक्तिपीठ भी कहा जाता है। इस शक्तिपीठ में देवी महालक्ष्मी की अष्टभुजा मूर्ति भी स्थापित है।

श्रीशैलम का यह स्थल शिव और शक्ति दोनों के उपासना स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ भक्त जन अपनी आस्था और श्रद्धा अर्पित करने आते हैं।

यात्रा मार्ग और सुविधाएँ

श्रीशैलम तक पहुँचने के लिए विभिन्न परिवहन सुविधाएँ उपलब्ध हैं। हैदराबाद और कुर्नूल निकटतम बड़े शहर हैं, जहाँ से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से श्रीशैलम पहुँचा जा सकता है। साथ ही, राज्य सरकार और निजी संगठनों द्वारा तीर्थयात्रियों के लिए विशेष बस सेवाएँ भी चलाई जाती हैं।

मंदिर परिसर के आस-पास श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशालाएँ और होटल उपलब्ध हैं। श्रीशैलम में यात्रियों की सुविधा के लिए खाने-पीने और अन्य सुविधाओं का भी उचित प्रबंध किया गया है।

निष्कर्ष

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और श्रीशैलम मंदिर न केवल शिव और शक्ति की उपासना का प्रमुख केंद्र है, बल्कि यह स्थान सांस्कृतिक धरोहर, प्राकृतिक सौंदर्य, और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम भी है। यहाँ आकर श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन के सभी कष्टों का निवारण होता है। श्रीशैलम की यात्रा एक धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करती है, जो हर भक्त के जीवन को समृद्ध और पवित्र बनाती है।

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