जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आसिफ उमर(ASIF UMAR) की पुस्तक ‘हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान’ का विमोचन 29 जुलाई, 2022 को लोधी रोड स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेन्टर में किया गया। पुस्तक का प्रकाशन ख़ुसरो फाउंडेशन ने किया है। पुस्तक विमोचन का आयोजन ख़ुसरो फाउंडेशन एवं इण्डिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री वेदप्रताप वैदिक जी थे। कार्यक्रम में विशेष अतिथि एवं विशिष्ठ अतिथि के रूप में हलीमा अज़ीज़ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. अफ़रोजुल हक़ तथा निदेशक लेखापरीक्षा के डायरेक्टर श्री मोहम्मद परवेज़ आलम ने शिरकत की। कार्यक्रम का संचालन प्रो. अख्तरुल वासे ने किया।
जामिया की कुलपति प्रो. नजमा अख़्तर ने आसिफ उमर और ख़ुसरो फाउंडेशन को संदेश भेज कर बधाई दी और डॉ आसिफ उमर(ASIF UMAR) के उज्जवल भविष्य की कामना की।

मुख्य अतिथि श्री वेदप्रताप वैदिक जी ने अपने वक्तव्य में पुस्तक की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक गंगा-जमुनी तहज़ीब को समझने में अत्यंत सहायक होगी। हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा भारतियों ने बगैर भेदभाव के की है और हिंदी ने भी सभी को सामान नज़र से देखा है। उन्होंने कहा कि डॉ. आसिफ़ उमर, हिंदी साहित्य के पूरे दौर का सफ़र कर के पाठकों के सामने एक ज्ञानवर्धक और तथ्यपरक पुस्तक लाते हैं। विमर्शों के इस दौर में इस तरह की पुस्तकों की बेहद आवश्यकता है।
यह पुस्तक समाज की उस एकता को दृष्टिगोचर करता है कि कोई भी साहित्य किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। वैदिक जी ने ख़ुसरो फाउंडेशन के डायरेक्टर प्रो. अख्तरुल वासे व डॉ. आसिफ़ उमर(ASIF UMAR) को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह का कार्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिये सहायक होगा।

विशेष अतिथि प्रो. अफरोजुल हक़ ने पुस्तक की तथ्यात्मकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि यह पुस्तक पूरे हिंदी साहित्य का एक ब्यौरा है। हिंदी साहित्य में होने वाले सभी परिवर्तनों, उसकी स्थितियों-परिस्थितियों को इस पुस्तक में बहुत बारीकी से रखा गया है. इस पुस्तक को पढ़ने से विद्यार्थियों में हिंदी और हिंदी साहित्य को लेकर एक समझ विकसित होगी।
विशिष्ठ अतिथि श्री परवेज़ आलम ने हिंदी भाषा की विशेषता पर बल देते हुए कहा कि भाषा और साहित्य की तमाम विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि इसकी कोई सीमा नहीं है। यह मनुष्य को जाति, धर्म, संप्रदाय आदि में बाँट कर नहीं देखता. यह सभी को सृजन का एक समान अवसर देता है. इसलिए अब यह विषय बेमानी हो गया है कि हिंदी लिखने या बोलने वाले कौन हो सकते हैं।

हिंदी भाषा और साहित्य ने अपने आगोश में कई भाषाओं के शब्दों को जगह दी है. इसीलिए हिंदी साहित्य का फलक अत्यंत व्यापक हो जाता है. उन्होंने आगे कहा कि जैसा कि इस पुस्तक का विषय है- हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान। पुस्तक के शीर्षक से ही ज्ञात हो जाता है कि हिंदी साहित्य के आरंभिक दौर से ही विभिन्न जाति, धर्म. संप्रदाय के साहित्यकारों ने हिंदी भाषा में साहित्य लिखना आरंभ कर दिया था।

कार्यक्रम में जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय आदि के अध्यापक एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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