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भारत में केले की खेती किसानों के लिए बेहतर आमदनी का साधन है। लेकिन बरसात के मौसम, खासकर अगस्त और सितंबर के महीने में, केले की फसल पर सिगाटोका रोग का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। यह रोग एक फफूंद जनित बीमारी है, जो समय रहते नियंत्रण न होने पर किसानों को भारी नुकसान पहुँचा सकती है।

पीला सिगाटोका (Yellow Sigatoka) के लक्षण

  • केले के नए पत्तों की ऊपरी सतह पर हल्के पीले रंग के धब्बे या धारीदार रेखाएँ दिखाई देती हैं।
  • समय के साथ ये धब्बे बड़े होकर भूरे रंग के हो जाते हैं और बीच का हिस्सा कत्थई रंग का दिखाई देता है।
  • इस रोग से केले की पत्तियाँ कमजोर हो जाती हैं और उत्पादन क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।

बचाव के उपाय

  • प्रतिरोधी किस्म के पौधे लगाएँ।
  • खेत को खरपतवार से मुक्त रखें और रोगग्रस्त पत्तियों को हटा कर नष्ट कर दें।
  • बारिश के दिनों में खेत से अतिरिक्त पानी की निकासी करें।
  • प्रति एकड़ खेत में 1 किलो ट्राईकोडर्मा विरिडे को 25 किलो गोबर खाद के साथ मिलाकर मिट्टी में डालें।

काला सिगाटोका (Black Sigatoka) के लक्षण

  • केले के पत्तों के निचले हिस्से पर काले धब्बे और लंबी धारियाँ बन जाती हैं।
  • यह रोग ज्यादा नमी और तापमान में तेजी से फैलता है।
  • संक्रमित पौधे के फल समय से पहले पक जाते हैं, जिससे किसानों को उचित लाभ नहीं मिलता और बाजार मूल्य घट जाता है।

बचाव के उपाय

  • प्रति लीटर पानी में 1 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड मिलाकर छिड़काव करें।
  • खेत या पौधों के आसपास पानी का जमाव बिल्कुल न होने दें।
  • पौधों के आसपास की गंदगी और संक्रमित पत्तों को तुरंत हटा दें।
  • जब तक पौधों को पानी की आवश्यकता न हो, अनावश्यक सिंचाई से बचें।

निष्कर्ष

सिगाटोका रोग, चाहे पीला हो या काला, दोनों ही केले की खेती के लिए बेहद हानिकारक हैं। यदि किसान समय पर इसके लक्षणों की पहचान कर लें और बताए गए उपायों को अपनाएँ, तो वे अपनी फसल को बचाकर बेहतर पैदावार और मुनाफा कमा सकते हैं।

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