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भारत विविधताओं वाला देश है, जहाँ विभिन्न भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं एक साथ फलती-फूलती हैं। लेकिन इस विविधता के साथ कई बार टकराव भी सामने आते हैं, विशेष रूप से भाषा के क्षेत्र में। महाराष्ट्र में लंबे समय से हिंदी बनाम मराठी भाषा विवाद एक संवेदनशील और राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह विवाद कब शुरू हुआ, इसके कारण क्या हैं, और इसके समाधान की संभावनाएं क्या हैं।

विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भाषाई आधार पर राज्य पुनर्गठन

भारत में 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया था। इसके बाद 1960 में महाराष्ट्र का गठन हुआ जो मराठी भाषियों के लिए एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इस समय से ही मराठी भाषा को राज्य की प्रमुख भाषा के रूप में मान्यता दी गई।

लेकिन मुंबई (तब की बंबई) में उस समय उत्तर भारत से आए लोगों की संख्या भी बड़ी थी। उत्तर भारतीय प्रवासियों के कारण हिंदी भाषा का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा, जिससे स्थानीय मराठी भाषियों के मन में अपनी भाषा और संस्कृति के भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना बढ़ने लगी।

विवाद की शुरुआत: कब और कैसे?

1960 के दशक से शुरू हुआ तनाव

1960 के दशक में ही शिवसेना जैसे राजनीतिक दलों ने “मराठी मानुष” के मुद्दे को उठाया और हिंदी और गैर-मराठी भाषाओं के प्रभाव के खिलाफ आंदोलन शुरू किए। मुंबई और अन्य शहरी इलाकों में मराठी युवाओं को नौकरी में प्राथमिकता देने की मांग जोर पकड़ने लगी।

हिंदी विरोध की लहर

हाल के वर्षों में जब हिंदी दिवस जैसे कार्यक्रमों पर ज़ोर दिया गया या जब केंद्र सरकार की नीतियों में हिंदी को प्राथमिक भाषा के रूप में बढ़ावा मिला, तो महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों में विरोध देखने को मिला। महाराष्ट्र में इसे “हिंदी थोपे जाने” के रूप में देखा गया।

विवाद के प्रमुख कारण

1. सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा

  • मराठी भाषियों को लगता है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। हिंदी को थोपने की किसी भी कोशिश को वे अपनी अस्मिता के खिलाफ मानते हैं।

2. प्रवासी आबादी का प्रभाव

  • उत्तर प्रदेश और बिहार से बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए मुंबई और पुणे जैसे शहरों में बस गए। इससे हिंदी भाषियों का प्रभाव बढ़ा और स्थानीय मराठी बोलने वालों में असंतोष गहराया।

3. राजनीतिक एजेंडा

  • शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) जैसे दलों ने भाषाई मुद्दों को राजनीतिक फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल किया। मनसे प्रमुख राज ठाकरे कई बार हिंदी भाषियों को निशाना बनाकर बयान दे चुके हैं।

4. शिक्षा और रोजगार में भाषा की भूमिका

  • शिक्षा संस्थानों और नौकरी में भाषा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। हिंदी बोलने वाले छात्रों को मराठी सीखने में परेशानी होती है, वहीं मराठी छात्रों को लगता है कि हिंदी वालों को अधिक अवसर मिलते हैं।

विवाद की घटनाएं और प्रतिक्रियाएं

  • मनसे द्वारा हिंदी फिल्मों का विरोध: समय-समय पर बॉलीवुड फिल्मों में हिंदी के अत्यधिक प्रयोग को लेकर मनसे ने विरोध प्रदर्शन किए हैं।
  • हिंदी में भाषणों पर आपत्ति: महाराष्ट्र विधानसभा में भी अगर कोई हिंदी में भाषण देता है, तो कुछ दल इसका विरोध करते हैं।
  • सार्वजनिक बोर्ड्स में मराठी अनिवार्यता: सरकार ने कई बार कोशिश की कि सभी दुकानों, कार्यालयों में मराठी में साइनबोर्ड होना अनिवार्य हो।

क्या है समाधान? कैसे हो सकता है अंत?

1. भाषाओं के सहअस्तित्व को स्वीकारें

  • हिंदी और मराठी दोनों भाषाएं भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं। किसी एक को दूसरे पर थोपने से विवाद पैदा होते हैं। सहअस्तित्व का सिद्धांत अपनाना ही समझदारी है।

2. शिक्षा में बहुभाषिकता को बढ़ावा

  • शिक्षा प्रणाली में हिंदी, मराठी और अंग्रेजी तीनों भाषाओं को संतुलित रूप से शामिल करना ज़रूरी है, ताकि हर वर्ग के छात्र खुद को उपेक्षित न महसूस करें।

3. राजनीतिक दलों को संयम बरतना होगा

  • राजनीतिक फायदे के लिए भाषाई मुद्दों को भड़काना बंद होना चाहिए। नेताओं को यह समझना चाहिए कि भाषाई विविधता भारत की ताकत है, कमजोरी नहीं।

4. संवाद की प्रक्रिया

  • राज्य और केंद्र सरकारों को मिलकर एक ऐसा मंच बनाना चाहिए जहाँ सभी भाषाओं के प्रतिनिधि बैठकर खुले संवाद के माध्यम से समाधान निकालें।

निष्कर्ष: भाषा नहीं, विचारों से हो पहचान

भाषा हमारे विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है, न कि विवाद का कारण। हिंदी बनाम मराठी विवाद दरअसल दो महान भारतीय भाषाओं के बीच कोई युद्ध नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मतभेदों की उपज है। यह विवाद तभी खत्म होगा जब हम एक-दूसरे की भाषा का सम्मान करना सीखेंगे और भाषाई विविधता को राष्ट्र की शक्ति मानेंगे।

जब तक भाषा को राजनीति का हथियार बनाया जाता रहेगा, यह विवाद चलता रहेगा। लेकिन अगर हम भाषा को जोड़ने का माध्यम मानें, तो यह विवाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

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