भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां हर साल लाखों टन कृषि अवशेष खेतों में निकलते हैं। इन अवशेषों को जलाने से वायु प्रदूषण, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसी समस्या का समाधान है – कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन। यह न केवल पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने का उपाय है, बल्कि किसानों के लिए एक अतिरिक्त आय स्रोत भी बन सकता है।
कृषि अवशेष: क्या होते हैं और कितने निकलते हैं?
कृषि अवशेष उन पदार्थों को कहा जाता है जो फसल कटाई के बाद बचते हैं, जैसे:
- धान और गेहूं की पराली
- गन्ने का बगास
- कपास की डंठल
- सरसों, मक्का, बाजरा जैसे फसलों के तने व पत्तियां
- सब्ज़ियों और फलों की बाहरी परतें
भारत में हर वर्ष लगभग 500 मिलियन टन कृषि अवशेष उत्पन्न होते हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है या जला दिया जाता है।
समस्या: पराली जलाना और उसका दुष्प्रभाव
उत्तर भारत के राज्यों विशेषकर पंजाब, हरियाणा, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पराली जलाने से हर वर्ष अक्टूबर-नवंबर में वायु प्रदूषण चरम पर पहुंचता है। इससे:
- वायु में PM2.5 और PM10 कण बढ़ जाते हैं।
- दिल्ली-NCR समेत कई क्षेत्रों में स्मॉग की स्थिति उत्पन्न होती है।
- सांस संबंधी बीमारियों और आंखों की जलन की शिकायतें बढ़ती हैं।
- मिट्टी की जैविक गुणवत्ता घटती है।
समाधान: कृषि अवशेष से ऊर्जा उत्पादन
आज तकनीक के माध्यम से कृषि अवशेषों से बायोगैस, बायो-CNG, बायोकोल और बायोएथेनॉल जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत तैयार किए जा सकते हैं। यह न केवल स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है, बल्कि किसानों को अवशेष बेचकर आय भी हो सकती है।
बायोगैस संयंत्र
- गोबर और फसल अवशेष से बायोगैस तैयार की जाती है।
- यह गैस घरों में खाना पकाने और जनरेटर चलाने में उपयोग की जाती है।
बायो-CNG
- बड़े स्तर पर अपशिष्ट से कम्प्रेस्ड बायोगैस बनाई जाती है।
- यह पेट्रोल और डीजल का विकल्प बन सकती है।
बायोकोल
- फसल अवशेषों को सुखाकर ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाता है।
एथेनॉल उत्पादन
- गन्ना, मक्का आदि से बायोएथेनॉल बनाकर पेट्रोल में मिलाया जाता है।
प्रमुख सरकारी पहलें
गोबरधन योजना (GOBAR-DHAN Yojana)
- इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस संयंत्र स्थापित करना है।
- यह योजना पशुधन और कृषि अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देती है।
राष्ट्रीय बायो-एनर्जी मिशन
- इसका उद्देश्य भारत में जैविक ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना है।
एथेनॉल सम्मिश्रण नीति
- पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को बढ़ाकर 20% तक करने का प्रयास।
- इससे गन्ना उत्पादक किसानों को लाभ मिल रहा है।
किसानों को लाभ कैसे?
- अवशेषों की बिक्री: फसल काटने के बाद बचा हुआ अवशेष अब बर्बाद नहीं होता, बल्कि कंपनियां व संयंत्र उसे खरीदती हैं।
- बायोगैस संयंत्रों से गैस और खाद: गांवों में छोटे संयंत्र से रसोई गैस और जैविक खाद दोनों प्राप्त होते हैं।
- रोज़गार के अवसर: संयंत्रों में स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है।
- पर्यावरणीय सुधार: पराली जलाने की आवश्यकता खत्म होने से वायु प्रदूषण में कमी आती है।
चुनौतियाँ और समाधान
| चुनौती | समाधान |
|---|---|
| किसानों में जागरूकता की कमी | पंचायत स्तर पर प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम |
| तकनीकी उपकरणों की लागत | सरकारी सब्सिडी और सहकारी मॉडल |
| अवशेषों का संग्रहण और परिवहन | ग्राम स्तर पर संग्रहण केंद्र |
निष्कर्ष
कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन न केवल एक पर्यावरणीय समाधान है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का टिकाऊ तरीका भी है। यदि सरकार, किसान और निजी कंपनियां मिलकर काम करें, तो यह मॉडल पूरे भारत में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। इससे न केवल वायु प्रदूषण नियंत्रित होगा, बल्कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए अधिक आत्मनिर्भर भी बनेगा।
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