jagannnath dham vivad

जगन्नाथ धाम विवाद :भारत एक ऐसा देश है जो प्राचीन काल से आध्यात्मिकता, संस्कृति और धर्म के लिए विख्यात रहा है। यहां अनेक ऐतिहासिक मंदिर और तीर्थ स्थल हैं, जो हमेशा से ही श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इन्हीं में से एक है ओडिशा के पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर, जिसे जगन्नाथ धाम भी कहा जाता है।

यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यता बल्कि ऐतिहासिक और वास्तुकला की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। हाल ही में पश्चिम बंगाल के दीघा शहर में भगवान विष्णु के एक नए मंदिर को “जगन्नाथ धाम” नाम देने पर विवाद उत्पन्न हो गया है। आइए विस्तार से जानें कि जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया था और यह वर्तमान में चर्चा का विषय क्यों बन गया है।

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जगन्नाथ धाम पर क्यों हुई आपत्ति?

हाल ही में पश्चिम बंगाल के समुद्र तट स्थित दीघा में भगवान विष्णु के एक मंदिर का उद्घाटन हुआ, जिसे “जगन्नाथ धाम” नाम दिया गया। इस नामकरण पर ओडिशा सरकार और पुरी के पुजारियों ने कड़ी आपत्ति जताई है। (जगन्नाथ धाम विवाद)

दरअसल, हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के चार प्रमुख धाम हैं— उत्तर में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारका, दक्षिण में रामेश्वरम और पूर्व में जगन्नाथ पुरी। मान्यता है कि भगवान विष्णु अपनी धाम यात्रा के दौरान पुरी में भोजन ग्रहण करते हैं। (जगन्नाथ धाम विवाद )

यही कारण है कि “जगन्नाथ धाम” के रूप में केवल पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर को ही धार्मिक मान्यता प्राप्त है। किसी अन्य स्थान को यह नाम देना धार्मिक परंपराओं के विरुद्ध माना जा रहा है। (जगन्नाथ धाम विवाद)

जगन्नाथ धाम का धार्मिक महत्त्व

ओडिशा का पुरी जगन्नाथ धाम हिंदुओं की आस्था और विश्वास का बहुत बड़ा केंद्र है। यहां भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। यह मंदिर चारों धामों में विशिष्ट महत्त्व रखता है क्योंकि इसे भगवान विष्णु की भोजन स्थली माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने से जीवन में मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इसे बैकुंठ भी कहा जाता है। स्कंदपुराण में भी पुरी का वर्णन मिलता है, जिसमें इसे शंख के आकार की नगरी बताया गया है, जो लगभग 16 किमी के क्षेत्र में फैली हुई है।

जगन्नाथ मंदिर का प्राचीन इतिहास

महाभारत में उल्लेख

पुरी के जगन्नाथ मंदिर का इतिहास महाभारत काल तक जाता है। महाभारत के वनपर्व में इसका वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि जगन्नाथ मंदिर का निर्माण मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था। कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न को भगवान जगन्नाथ ने सपने में दर्शन देकर मंदिर बनाने का आदेश दिया था।

मूर्ति चोरी और निर्माण की कथा

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति पहले नीलांचल पर्वत स्थित एक गुफा में “नीलमाधव” के रूप में स्थापित थी, जिसकी पूजा सबर समुदाय करता था। राजा इंद्रद्युम्न के ब्राह्मण सेवक विद्यापति ने इसे चुराकर राजा को सौंप दिया था। मूर्ति के चोरी होने पर भगवान नाराज होकर वापस गुफा में लौट गए।

तब भगवान ने राजा इंद्रद्युम्न को सपने में समुद्र में तैरती हुई नीम की लकड़ी से नई मूर्तियां बनवाने का आदेश दिया। राजा के अनेक प्रयासों के बाद सबर मुखिया विश्ववसु ने लकड़ी निकालकर दी। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा ने बूढ़े ब्राह्मण के रूप में आकर मूर्तियां बनाना शुरू किया।

शर्त के अनुसार कोई भी उनकी प्रक्रिया में व्यवधान नहीं डाल सकता था, परन्तु राजा ने अधीर होकर कक्ष खोल दिया, जिसके कारण मूर्तियां अधूरी रह गईं। यही अधूरी मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गईं।

वर्तमान मंदिर का निर्माण और पुनर्निर्माण

कलिंग वंश द्वारा निर्माण

जगन्नाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव के शासनकाल (1078-1148 ई.) में बना। मंदिर के मुख्य भाग (जगमोहन और विमान) का निर्माण इसी काल में पूरा हुआ। बाद में राजा अनंग भीम ने 1174 ईस्वी में इसका जीर्णोद्धार करवाया। मंदिर परिसर में लगभग 30 छोटे मंदिर भी स्थित हैं।

वास्तुकला

जगन्नाथ मंदिर कलिंग शैली की उत्कृष्ट कृति है। मंदिर का मुख्य भवन 214 फीट ऊंचे पत्थर के आधार पर निर्मित है। मंदिर के शीर्ष पर भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र (नीलचक्र) स्थापित है, जो अष्टधातु से बना है। इस चक्र की विशेषता है कि पुरी शहर के किसी भी कोने से देखने पर यह हमेशा बीच में दिखाई देता है। मंदिर परिसर में विशाल 20 फीट ऊंची दीवार बनी हुई है। मंदिर के गर्भगृह में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां विराजित हैं।

मंदिर का महत्त्वपूर्ण रत्न भंडार

पुरी के जगन्नाथ मंदिर में एक विशाल रत्न भंडार भी है, जहां भगवान को समर्पित अनेक बहुमूल्य आभूषण व रत्न रखे हुए हैं। यह भंडार पूर्व में 1905, 1926, 1978, और 1985 में खोला गया था। 2018 में रत्न भंडार की चाबी खो जाने का मामला काफी चर्चा में आया था। जुलाई 2024 में इस भंडार को फिर से खोला गया। इस भंडार की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ओडिशा के चुनावी दौरे में चर्चा कर चुके हैं।

विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा

पुरी का जगन्नाथ मंदिर हर साल होने वाली रथ यात्रा के कारण भी विश्व विख्यात है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशेष रथों पर विराजित कर शहर भ्रमण कराया जाता है। यह रथ यात्रा देखने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।

निष्कर्ष

पुरी का जगन्नाथ मंदिर भारतीय संस्कृति, इतिहास और धार्मिक आस्था का अनुपम प्रतीक है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में “जगन्नाथ धाम” नाम का प्रयोग विवाद का कारण बना है। ऐसी धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं का सम्मान करना आवश्यक है, ताकि धार्मिक सौहार्द्र और सांस्कृतिक एकता बनी रहे। (जगन्नाथ धाम विवाद)

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FAQ On जगन्नाथ धाम विवाद

जगन्नाथ मंदिर का निर्माण किसने कराया था?

जगन्नाथ मंदिर का प्रारंभिक निर्माण मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने कराया था। वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण कलिंग के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव के द्वारा 12वीं सदी (1078-1148 ईस्वी) में कराया गया था। मंदिर के जीर्णोद्धार में राजा अनंग भीम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला कैसी है?

पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर कलिंग वास्तुकला शैली में बना है। मंदिर का मुख्य भाग वक्ररेखीय आकार में है। इसकी ऊंचाई करीब 214 फीट है और इसके शिखर पर अष्टधातु से निर्मित भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र (नीलचक्र) स्थापित है।

पुरी के जगन्नाथ मंदिर को ‘जगन्नाथ धाम’ क्यों कहते हैं?

हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के चार प्रमुख धाम हैं— उत्तर में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारिका, दक्षिण में रामेश्वरम और पूर्व में जगन्नाथ पुरी। भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ यहां निवास करते हैं, इसीलिए इसे जगन्नाथ धाम कहा जाता है।

हाल ही में जगन्नाथ धाम(जगन्नाथ धाम विवाद) चर्चा में क्यों आया है?

हाल ही में पश्चिम बंगाल के दीघा में एक नए मंदिर का नाम ‘जगन्नाथ धाम’ रखा गया है। इस पर ओडिशा सरकार और पुरी मंदिर प्रशासन ने आपत्ति जताई है, क्योंकि हिन्दू धर्म में जगन्नाथ धाम के रूप में केवल पुरी के मंदिर को ही मान्यता मिली है।

जगन्नाथ मंदिर की धार्मिक विशेषता क्या है?

जगन्नाथ मंदिर की धार्मिक विशेषता इसकी रथयात्रा है, जो विश्व प्रसिद्ध है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को रथों में बिठाकर शहर भ्रमण कराया जाता है। इस मंदिर में महाप्रसाद के रूप में 56 प्रकार के विशेष व्यंजन तैयार होते हैं।

जगन्नाथ मंदिर में रत्न भंडार क्या है?

पुरी मंदिर के अंदर एक रत्न भंडार है, जहां भगवान के लिए चढ़ाए गए बेशकीमती गहने और रत्न सुरक्षित रखे गए हैं। यह भंडार पहले 1905, 1926, 1978, 1985 और जुलाई 2024 में खोला गया था।

मंदिर के रत्न भंडार की चाबी गुम होने का मामला क्या था?

साल 2018 में सरकार ने मंदिर की सुरक्षा जांच के दौरान पाया कि रत्न भंडार की चाबी खो गई है। इसे लेकर देशभर में काफी विवाद हुआ था और जुलाई 2024 में इसे दोबारा खोलने की अनुमति मिली थी।

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति अधूरी क्यों है?

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां विश्वकर्मा द्वारा बनवाई जा रही थीं, मगर राजा इंद्रद्युम्न ने विश्वकर्मा के नियमों को तोड़ते हुए समय से पहले उस स्थान पर प्रवेश कर दिया, जिससे मूर्तियां अधूरी रह गईं। यही अधूरी मूर्तियां आज मंदिर में स्थापित हैं।

मंदिर के निर्माण की कथा क्या है?

राजा इंद्रद्युम्न को भगवान जगन्नाथ ने सपने में दर्शन देकर मंदिर निर्माण की प्रेरणा दी थी। उसके बाद राजा ने मूर्ति के लिए नीम की लकड़ी निकलवाई, जिससे भगवान विश्वकर्मा ने मूर्तियां बनानी शुरू की। लेकिन नियम टूटने पर मूर्तियां अधूरी रह गईं।

जगन्नाथ मंदिर की प्रमुख मान्यता क्या है?

माना जाता है कि भगवान विष्णु चार धाम यात्रा करते समय पुरी में भोजन करते हैं। इसलिए इस मंदिर को ‘मोक्ष का धाम’ भी कहा जाता है, जहां दर्शन से व्यक्ति की मुक्ति होती है।


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By Admin

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