Capsicum Farming: कृषि क्षेत्र में लगातार हो रहे नवाचार और आधुनिक तकनीकों के प्रयोग से अब वह फसलें भी मैदानी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जा रही हैं, जिन्हें पहले केवल ठंडे इलाकों में उगाया जाता था। शिमला मिर्च ऐसी ही एक सब्जी है, जिसकी खेती आज देश के विभिन्न हिस्सों में संभव हो गई है।
वैज्ञानिक विधियों और उन्नत किस्मों के इस्तेमाल से किसान प्रति हेक्टेयर 30 से 50 क्विंटल तक शिमला मिर्च का उत्पादन कर सकते हैं, जिससे अच्छी कमाई संभव है। शिमला मिर्च की खेती में यदि कुछ महत्वपूर्ण सावधानियों का ध्यान न रखा जाए तो फसल को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। आइए जानते हैं शिमला मिर्च की खेती से जुड़ी जरूरी जानकारियां।
किन इलाकों में होती है शिमला मिर्च की खेती(Capsicum Farming)
विशेषज्ञों के अनुसार, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में शिमला मिर्च की खेती बड़े स्तर पर की जाती है। इन इलाकों की जलवायु और मिट्टी की बनावट शिमला मिर्च के उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है।
शिमला मिर्च की खेती(Capsicum Farming) का पहला चरण: मिट्टी और तापमान का चयन
शिमला मिर्च की अच्छी पैदावार के लिए चिकनी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है, जिसमें जल निकासी की उत्तम व्यवस्था हो। खेत की मिट्टी का pH मान 6 से 6.5 के बीच होना चाहिए। अगर बलुई दोमट मिट्टी में खेती कर रहे हैं तो किसानों को अधिक जैविक खाद और नियमित सिंचाई करनी चाहिए।
शिमला मिर्च की खेती(Capsicum Farming) के लिए 21 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। बीज बोने से पहले खेत में 25 टन सड़ी गोबर की खाद डालनी चाहिए, साथ ही बुवाई के समय 60 किलो नाइट्रोजन, 80 किलो फास्फोरस और 60 किलो पोटाश मिलाना जरूरी है। नाइट्रोजन का आधा हिस्सा रोपाई के समय और शेष 55 दिन बाद देना चाहिए।
शिमला मिर्च की किस्में और बीज उपचार
किसान विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार, अर्का गौरव, अर्का मोहिनी, कैलिफोर्निया वांडर, ऐश्वर्या, अलंकार, पूसा दीप्ति जैसी उन्नत किस्मों का चुनाव करना चाहिए। बुवाई से पहले बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या बावस्टिन के घोल में उपचारित कर क्यारियों में बोना चाहिए, ताकि बीजजनित रोगों से बचाव हो सके। (Capsicum Farming)
शिमला मिर्च की खेती(Capsicum Farming) का दूसरा चरण: पौध रोपाई और सिंचाई
पौधे की रोपाई का सही समय जुलाई से दिसंबर और जनवरी तक का माना जाता है। रोपाई हमेशा शाम के समय करनी चाहिए और प्रत्येक पौधे के बीच 60 सेंटीमीटर की दूरी रखनी चाहिए। रोपाई से पहले पौधे की जड़ों को एक लीटर पानी में 1 ग्राम बावस्टिन मिलाकर आधा घंटा भिगोना चाहिए। रोपण के तुरंत बाद खेत में हल्की सिंचाई करना जरूरी है।
वहीं खरपतवार नियंत्रण के लिए पौधे लगाने के 2-3 दिन बाद स्टांप 3 लीटर को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। पौध रोपण के करीब एक महीने बाद पौधों के आधार पर मिट्टी चढ़ाने से जड़ें मजबूत होती हैं। (Capsicum Farming)
शिमला मिर्च की खेती(Capsicum Farming) का तीसरा चरण: रोग और कीट प्रबंधन
शिमला मिर्च की खेती में रोग और कीट नियंत्रण बेहद जरूरी है। नर्सरी में आर्द्रगलन रोग सबसे पहले दिखाई देता है, जिसमें पौधे का तना नीचे से गलने लगता है। इससे बचाव के लिए बीजों को कार्बेंडाजिम या कैप्टान से उपचारित करना चाहिए।
पर्णकुंचन रोग के चलते पौधे के पत्ते सिकुड़ने और रंग बदलने लगते हैं, जिसे नियंत्रित करने के लिए बुवाई से पहले कार्बोफ्यूरान मिलाना चाहिए और पौध रोपाई के 20 दिन बाद डाइमिथोएट का छिड़काव करना चाहिए।
श्यामवर्ण रोग के प्रकोप से पौधों पर काले धब्बे आने लगते हैं और पूरी शाखाएं सूखने लगती हैं। इस रोग के इलाज के लिए बैंकोजेब, जिनेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव करना फायदेमंद होता है।
वहीं, फुदका और रसाद कीट जैसे कीट पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देते हैं। इनके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास या डाइमिथोएट का छिड़काव हर 10-15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। कटुआ कीट जो पौधों को काटकर नष्ट कर देता है, उसके नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरान को रोपण से पहले मिट्टी में मिला देना चाहिए।
वैज्ञानिक विधियों से शिमला मिर्च की खेती बनेगी फायदे का सौदा
यदि किसान शिमला मिर्च की खेती(Capsicum Farming) वैज्ञानिक तरीके से करें और बीज चयन से लेकर पौध संरक्षण तक हर चरण में सावधानी बरतें तो वे बहुत अच्छी उपज प्राप्त कर सकते हैं।
रोग और कीटों का समय पर नियंत्रण, उचित खाद प्रबंधन और सही सिंचाई तकनीक अपनाकर शिमला मिर्च की फसल से किसान मोटा मुनाफा कमा सकते हैं। बदलती जलवायु परिस्थितियों में शिमला मिर्च जैसी फसलें किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन सकती हैं।
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