ज़िंदगी आइस पाइस

जिंदगी क्या है एक खेल ही तो है आप कितने दिन ये खेल, खेल सकते हैं ये तो खैर आपकी काबिलियत पर निर्भर करता है. परन्तु जिस तरह ने निखिल सचान जी ने अपने पुस्तक नमक स्वादानुसार में किया था और नमक ने उस पुस्तक को पूरा खराब कर दिया था. वो गलती उन्होंने इस पुस्तक ज़िन्दगी आइस पाइस में बिल्कुल भी नहीं किया है। खैर ये पुस्तक पिछले पुस्तक भ्रांतियों को तोड़ते हुए एक नए पन में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत होती है और पाठकों को उनके जीवन से जुड़े आइस पाइस और जीवन में लगने वाले धप्पे को बखूबी से दिखाती है।

वहीं ये पुस्तक ये भी दिखाती है कि आप ज़िंदगी के आइस पाइस में हारने वाले पक्ष में हैं या जीतने वाले पक्ष से. क्योंकि ज़िंदगी आइस पाइस में जीतने वाला बाजीगर तो हारने वाला क्या होता है ये कभी भी न तो बचपन में खेलते हुए सोचा और न ही सोचकर बचपन को वर्तमान के हाथों चढ़ाना चाहता हूँ.. खैर….

निखिल सचान द्वारा लिखी उनकी दूसरी पुस्तक जिंदगी आइस पाइस को समाज में अंकुरित होते हुए उन पुष्पों कि इतनी सहजता से सजाया है कि पढ़ने वाला अवाक हो जाए और कुछ समय के लिए उसकी बुद्धि काम करना बंद करके उसे केवल प्यार रूपी प्रेमिका की तरह बस निहारता ही रहे. हां, ये बात अलग है कि कहीं कहीं बोरिंग सा लग सकता है. परन्तु ध्यान रखिए कि लेखक सचान कि लेखनी किस विधा और किसके लिए लिखी गई है. हो सकता है कि आपको एक उम्र के पड़ाव के बाद इनके लेखन भी अच्छे न लगें. पर जिस आयु के वर्ग के लिए उन्होंने अपना लेखन किया है शायद ही उसे गलत लगे.

वैसे मुझे ज्यादातर ऐसे उपन्यास या कहानियां पसंद हैं जो लंबी होती हैं और लंबी होने के साथ उनमें शुरुआत से लेकर अंत तक एक तारतम्यता और एकरूपता होती है ऐसे लेख पढ़ना मुझे पसंद है. पर इसके बावजूद मुझे लेखक सचान द्वारा लिखी इस पुस्तक ने इक्की दुक्की जगह छोड़ कर कहीं नीरस नहीं किया. जैसा कि उनके पहले पुस्तक को पढ़ते हुए मेरे साथ हुआ ऐसे के उस पुस्तक कि समीक्षा न करने का मन बनाया और अभी भी कायम हूं.

बात करें ज़िन्दगी आइस पाइस के मेरे सबसे अच्छे चैप्टर कि, तो वह चैप्टर रहा कैनवस के जूते और रात रानी के तेल, मुझे यह इसलिए भी ज्यादा पसंद आया क्योंकि इसको पढ़ते हुए मुझे अपने दादा दादी के चेहरे सामने आ गाए. बस उसी समय अमेज़न किंडल बंद किया और उनसे बात करके दुबारा अंतिम चैप्टर को पढ़ा.

वहीं दूसरे चैप्टर जो मुझे अच्छा लगा वो था क्यूट मोहन जी, को शादी होने के बाद सही ट्रैक पर इसलिए आ गए थे क्योंकि अब वे किसी के डाकू से क्यूट मोहन हो गए थे. फिर एक परवाज़ इसलिए भी पसंद आया क्योंकि इसने गाँव के उन यादों को ताजा कर दिया जो शहर में आने के बाद कहीं छूट सा गया था।

19 तियां 57 चैप्टर तो ऐसा लगा जैसे किसी मेरे जिंदगी के पन्ने से उस पन्ने को निकाल कर अपने कॉपी में चिपका दिया हो. बाकी अन्य कहानियां भी मस्त हैं पर अगर कहें तो स्नैपशॉट (थोड़ा आप भी बूझिए नाम) ने थोड़ा तो नीरस किया मुझे और इसे एक बार साइड कर दें तो आपको सब अच्छा लग सकता है. और हां किताब को अगर कहा जाए तो लेखन में लेखक ने उतना है नमक परोसा है जितने के लिए सामने वाले कि चाह है, न थोड़ा कम और न थोड़ा ज्यादा……. बाकी आप पढ़ कर बताइएगा कि आपको ये पुस्तक कैसे लगी….

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By Admin

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