भारत और अमेरिका के संबंध ऐतिहासिक रूप से सहयोग और टकराव के मिश्रण से बने हैं। रणनीतिक साझेदारी, रक्षा समझौते, और व्यापारिक संबंध दोनों देशों को जोड़ते हैं, लेकिन समय-समय पर कुछ ऐसे मुद्दे सामने आते हैं जो रिश्तों में खटास डाल देते हैं।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (2017–2021) के कार्यकाल में, यह खटास कई बार खुलकर सामने आई। ट्रंप ने खुले मंच से भारत को “टैरिफ किंग” कहा और पीएम नरेंद्र मोदी से नाराज़गी जताई। यह नाराज़गी सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि गहरी आर्थिक और व्यापारिक असहमति पर आधारित थी।
नाराज़गी की जड़: व्यापार असंतुलन
अमेरिका के लिए घाटे का सौदा
ट्रंप प्रशासन का मानना था कि अमेरिका-भारत व्यापारिक रिश्ते संतुलित नहीं हैं।
- भारत अमेरिका को कपड़े, आभूषण, दवाइयाँ, आईटी सेवाएँ, कृषि उत्पाद आदि बड़ी मात्रा में निर्यात करता है।
- जबकि अमेरिका से भारत में आने वाले उत्पाद और सेवाओं की मात्रा अपेक्षाकृत कम है।
अमेरिका के वाणिज्य विभाग के 2018 के आंकड़ों के अनुसार:
- भारत ने अमेरिका को 54.4 अरब डॉलर का निर्यात किया।
- जबकि अमेरिका ने भारत को केवल 33.1 अरब डॉलर का निर्यात किया।
इस तरह अमेरिका को सालाना लगभग 21 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ।
ट्रंप का दृष्टिकोण
ट्रंप का कहना था कि अमेरिका को “फ्री और फेयर ट्रेड” चाहिए, न कि “वन-साइडेड ट्रेड”। उनका आरोप था कि भारत अमेरिकी कंपनियों को बाजार में समान अवसर नहीं देता, जबकि अमेरिकी बाजार भारतीय उत्पादों के लिए खुला है।
टैरिफ विवाद: आयात शुल्क पर टकराव
भारतीय टैरिफ नीति से असंतोष
भारत ने कई अमेरिकी कृषि उत्पादों और वस्तुओं पर उच्च आयात शुल्क लगाया हुआ था।
- अमेरिकी बादाम: आयात शुल्क 30% तक।
- अखरोट: 100% शुल्क।
- सेब: 50% शुल्क।
ट्रंप का तर्क था कि जब अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर इतना अधिक टैक्स नहीं लगाता, तो भारत को भी अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैरिफ नहीं लगाना चाहिए।
अमेरिका की प्रतिक्रिया
2019 में ट्रंप प्रशासन ने भारत को GSP (Generalized System of Preferences) प्रोग्राम से बाहर कर दिया।
इस प्रोग्राम के तहत भारत के लगभग 5.6 अरब डॉलर के निर्यात को अमेरिकी बाजार में ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलती थी। ट्रंप का आरोप था कि भारत अमेरिकी कंपनियों को बराबरी का बाजार एक्सेस नहीं देता।
GSP लाभ की समाप्ति: बड़ा झटका
GSP क्या है?
- GSP एक अमेरिकी योजना है जिसके तहत विकासशील देशों को अमेरिकी बाजार में बिना शुल्क या कम शुल्क पर अपने उत्पाद बेचने की अनुमति मिलती है।
- भारत इसके सबसे बड़े लाभार्थियों में था। लेकिन जून 2019 में ट्रंप प्रशासन ने यह लाभ खत्म कर दिया।
कारण
अमेरिका के अनुसार:
- भारत ने अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनियों (जैसे Amazon, Walmart-Flipkart) के लिए प्रतिबंध लगाए।
- मेडिकल उपकरणों और कृषि उत्पादों पर ऊँचे आयात शुल्क बनाए रखे।
- अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए “धार्मिक कारणों” से आयात नियम सख्त रखे।
रक्षा और टेक्नोलॉजी: बाजार की सीमाएँ
अमेरिका की अपेक्षाएँ
- ट्रंप प्रशासन चाहता था कि भारत अमेरिकी रक्षा उपकरण, एयरक्राफ्ट, और टेक्नोलॉजी की खरीद बढ़ाए।
भारत की रणनीति
- पीएम मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम स्थानीय उत्पादन और आत्मनिर्भरता पर जोर देता है।
- इसका मतलब था कि भारत अपने रक्षा और तकनीकी उत्पाद घरेलू कंपनियों से या जॉइंट वेंचर के तहत बनाना चाहता था।
यह नीति अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में सीधे कारोबार करना मुश्किल बना रही थी, जिससे ट्रंप नाराज़ थे।
ट्रंप की खुली आलोचना
“टैरिफ किंग” का बयान
2018 और 2019 में, ट्रंप ने कई मौकों पर कहा:
“India is the tariff king. Nobody knows it better than us.”
यह बयान संकेत था कि ट्रंप भारत को उच्च आयात शुल्क लगाने वाला देश मानते थे और इससे अमेरिकी निर्यातकों को नुकसान पहुंच रहा है।
फिर भी व्यक्तिगत संबंध अच्छे
दिलचस्प बात यह है कि नाराज़गी के बावजूद, ट्रंप और मोदी की व्यक्तिगत बॉन्डिंग मजबूत मानी जाती थी।
- 2019 में ह्यूस्टन का “Howdy Modi” इवेंट।
- 2020 में अहमदाबाद का “Namaste Trump” कार्यक्रम।
इन कार्यक्रमों में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की खुलकर तारीफ की, लेकिन व्यापार विवाद का समाधान नहीं हो पाया।
निष्कर्ष: राजनीति और व्यापार का समीकरण
ट्रंप की पीएम मोदी से नाराज़गी मुख्य रूप से व्यापार असंतुलन, ऊँचे टैरिफ और अमेरिकी कंपनियों के लिए सीमित बाजार पहुंच पर आधारित थी।
भारत पर टैरिफ लगाना और GSP लाभ समाप्त करना, ट्रंप के लिए अमेरिकी उद्योगों, किसानों और कंपनियों के हितों की रक्षा का तरीका था।
हालांकि, इन विवादों के बावजूद, दोनों देशों ने रक्षा सहयोग, आतंकवाद विरोध, और इंडो-पैसिफिक रणनीति जैसे क्षेत्रों में साझेदारी बनाए रखी।
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