स्लीपर सेल (Sleeper Cell) आतंकवाद का एक खतरनाक और छिपा हुआ चेहरा है, जो आम जनता के बीच रहकर काम करता है।
ये पूरी तरह से प्रशिक्षित आतंकी एजेंट होते हैं जो लंबे समय तक निष्क्रिय रहकर किसी खास इशारे का इंतजार करते हैं। जानिए कैसे काम करता है आतंकियों का यह नेटवर्क:
सामान्य जीवन जीते हैं: स्लीपर सेल के सदस्य आम नागरिकों की तरह रहते हैं – नौकरी करते हैं, मकान किराए पर लेते हैं, सामाजिक मेलजोल रखते हैं ताकि किसी को शक न हो।
पाकिस्तान का नेटवर्क: पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवादियों को संरक्षण देता आया है। भारत में भी उसका स्लीपर सेल नेटवर्क फैला हुआ है।
एक्टिवेशन का इशारा: जब कोई मिशन शुरू करना होता है, तब इन्हें एक खास संकेत भेजा जाता है। यह संकेत कोडवर्ड, कॉल, टेक्स्ट मैसेज, गेम या मोबाइल ऐप के जरिए हो सकता है।
खुद को नहीं होता पूरी जानकारी: कई बार स्लीपर एजेंट्स को खुद भी यह नहीं पता होता कि वे किस बड़े नेटवर्क का हिस्सा हैं। उन्हें सीमित जानकारी और टास्क दिए जाते हैं।
धीरे-धीरे टास्क मिलते हैं: शुरू में इन्हें छोटे-मोटे टास्क दिए जाते हैं ताकि वे आसानी से सिस्टम में घुल-मिल जाएं और सुरक्षा एजेंसियों की नजर में न आएं।
सोशल मीडिया और गेम्स का इस्तेमाल: स्लीपर सेल्स को निर्देश देने के लिए अब सोशल मीडिया, चैटिंग ऐप्स और यहां तक कि ऑनलाइन वीडियो गेम्स का भी इस्तेमाल किया जाता है।
हमले से ज्यादा जासूसी: इनका मकसद केवल हमला करना नहीं होता। ये सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और आतंकियों को गुप्त जानकारी देते हैं।
रिकॉर्ड से बाहर लोग चुने जाते हैं: स्लीपर सेल के लिए ऐसे लोग चुने जाते हैं जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होता, ताकि उनके बारे में कोई सुराग न मिले।
हर बड़ी आतंकी घटना में भूमिका: भारत में जब भी कोई बड़ी आतंकी घटना होती है, जांच में अक्सर स्लीपर सेल्स की भूमिका सामने आती है।
सुरक्षा एजेंसियां सतर्क: पुलिस और खुफिया एजेंसियां अब अधिक तकनीकी रूप से सक्षम हैं और स्लीपर सेल्स को पहचानने व रोकने के लिए लगातार निगरानी रख रही हैं।
स्लीपर सेल्स आतंकवाद का सबसे खतरनाक और छिपा हुआ रूप हैं। इनकी पहचान करना और इन्हें समय रहते निष्क्रिय करना देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है।