Farmer standing at a fence with cattle by Jean Bernard (1775-1883). Original from The Rijksmuseum. Digitally enhanced by rawpixel.
Farmer standing at a fence with cattle by Jean Bernard (1775-1883). Original from The Rijksmuseum. Digitally enhanced by rawpixel. by Rijksmuseum is licensed under CC-CC0 1.0

BY SHUBHAM KUMAR

लोकतंत्र की पहली गूंज पूरी दुनिया को सुनाने वाला, लोकतन्त्र की जननी के रूप में प्रख्यात हमारा भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था के केंद्र बिंदु और भारतीयों के जीवन की धुरी है।

देश की 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्यो पर ही निर्भर है। इसका जीवंत उदाहरण है कोरोना महामारी के दौरान मजदूरों का अपने गाँव की ओर लौटना, उनको यह पूरा भरोसा था कि औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण के चकाचौंध से इतर गाँव ही एक ऐसा जगह और कृषि ही एक ऐसा कार्य क्षेत्र है जहाँ हम कुछ ज्यादा तो नहीं कमा पायेंगे पर भूखे भी नहीं मरेंगे।

भारत के किसान दो तरह के है – एक वो जिनके पास ज्यादा जमीन है (जमींदार) और दूसरा वो जिनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है (बटाईदार)। इनके पास जमीन तो नहीं पर श्रम शक्ति जरूर है, इस कारण ज़मींदार इन किसानो को अपनी जमीन अधिया पर देते हैं, खर्च भी आधा देते हैं और लाभ भी आधा ही लेते हैं पर अन्तर बस इतना सा होता है कि ना तो ये लोग किसी तरह के श्रम मे योगदान देते हैं और ना ही फसलों को सही जगह और सही कीमत पर बेचने में किसानों की मदद करते हैं।

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सरकार की लाभकारी और कल्याणकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ से भी बटाईदार किसानो वंचित ही रह जाता हैं। योजनाओं से मिलने वाला लाभ भी ज़मींदार खुद ही ले लेता है। इसका मुल कारण है किसानो को इसकी सही जानकरी नहीं होना, पढ़ा लिखा नहीं होना या फिर नाम मात्र ही पढ़ा होना और कृषि सलाहकारों बटाईदार द्वारा किसानो को मदद नहीं मिलना इत्यादि।

किसानो की इस दयनीय स्थिति में सुधार के लिए हमारे नीति-नियंता को कुछ आवश्यक कदम उठाना चाहिए। जैसे :- सरकार द्वारा कृषि सम्बन्धी सुधारों की जो भी योजना लाई जाये उसमे बटाईदार किसानों के हितों का भी ख्याल रखा जाना चाहिए साथ ही साथ सरकार जो भी योजना लाती है, उसका विज्ञापन जमीनी स्तर पर और आसान भाषा, आसान शब्दों में करना चाहिए ताकि किसानों तक सही जानकारी पहुँचे।

हमारे देश के किसानो मे ज्यादातर किसान प्राथमिक स्तर तक ही शिक्षा ग्रहण किये हुए हैं या फिर अनपढ़ हैं। यहाँ तक कि इस तरह के गरीब परिवारों के युवा पीढ़ी का भी हाई स्कूल जाते-जाते या तो संसाधनों के अभाव में या फिर कई अन्य कारणों से शिक्षा से मोहभंग हो रहा है।

सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्राथमिक शिक्षा के पाठयक्रमों मे किसानों को लाभान्वित करने वाले महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल करना चाहिए। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से होने वाले फसल के नुकसान के मामले में राज्य या बीमा कंपनियों से किसानों को अनिवार्य राहत मिले।

आधुनिकता के इस दौर में केवल कृषि उपकरणों के विकास की असली उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव हो पायेगा, अधिया किसानों का कल्याण हो पाएगा। बटाईदार किसानों के जीवन में परिवर्तन आएगा। भारत का हर छोटे किसान समृद्ध हो पाएगा और एक नये कृषिप्रधान भारत का नव निर्माण हो पाएगा।

यह पोस्ट लेखक शुभम कुमार द्वारा लिखा गया है…… इनसे जुड़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें….mail id – [email protected] कर देना|

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One thought on “विकासशीलता के दौर में, तरक्की की बाट जोहता बटाईदार (अधिया) किसान”

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