ये दिल्ली की ज़ामा मस्जिद है

मरम्मत की भूख से चीखती दिल्ली की जामा मस्जिद

BY MD SHADAN AYAZ

ग़ाज़ियाबाद से इंटरव्यू देकर लौटते हुए अचानक से मन हुआ कि जामा मस्जिद मेट्रो स्टेशन पर उतर कर, फिर से जामा मस्जिद देखा जाए, साथ मे दो मित्र भी थे जिनमें से एक ने कभी जामा मस्जिद नही देखा था इसी वजह से हम तीनों का मस्जिद जाना और पक्का हुआ। चूँकि पत्रकारिता के छात्र के तौर पर पहली बार हम जामा मस्जिद जा रहे थे इसलिए इस बार अलग नज़रिये से मस्जिद देखना हुआ और जो देखा उससे दिल बैठ गया। जामा मस्जिद भारतीय इस्लामिक वास्तुकला का बेमिशाल उदाहरण, दिल्ली की शान जामा मस्जिद, इन दिनों मरम्मत की भूख से चीख रही है।

मगर इसकी चीख कोई सुनने वाला नही है। दिल्ली सरकार के पास उचित कारण है क्योंकि जामा मस्जिद राष्ट्रीय धरोहर है और भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ( एएसआई- ARCHAEOLOGICAL SURVEY OF INDIA ) के अधीन है। ऐसे में सीधे-सीधे इसका रख-रखाव केंद्र सरकार के अधीन एएसआई करेगी या जामा मस्जिद कमेटी। मगर कमेटी के पास इतनी रकम नही है के विशाल जामा मस्जिद का जीर्णोद्धार कर सके तो घूम फिर कर जिम्मेदारी की सुई एएसआई पर ही लटकती है मतलब के घुमा फिरा कर केंद्र सरकार पर।

सत्रहवीं शताब्दी में मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा बनवाई गई विशाल जामा मस्जिद भारत की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। चुना पत्थर और संगमरमर से निर्मित यह भारतीय इस्लामिक वास्तुकला का नायाब उदहारण है। ऐसी वास्तुकला सिर्फ भव्य इमारतों की प्रतीक नहीं होती ये देश का गौरव है तो देशवासियों के लिए विरासत से तोहफा। जामा मस्जिद के कल में झाँका जाए तो हम देखेंगे आज़ादी के लिये संघर्षरत भारतीय जिनके लिए जामा मस्जिद एक घर थी।

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1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय यही मस्जिद अंग्रेजों के लिए आँख का कांटा बन गयी थी। यहाँ तब की हुकूमत के ख़िलाफ़ विरोध को स्वर मिलता था फिर चाहे वो मुसलमान हो या हिंदू यह आंदोलनकारियों का गढ़ था। इसलिए अंग्रेज़ी सरकार ने जामा मस्जिद को बंद कर दिया और यहाँ तक के इसको तोड़ने की भी योजना थी मगर किसी ने कहा था।


‘फानूस बन कर जिसकी हिफ़ाजत हवा करे’
‘वो शमा क्या बुझे जिसकी हिफाज़त खुदा करे’


मस्जिद को तोड़ना टल गया था मगर फिर भी अंग्रेज़ी सरकार ने मुसलमानो से अपनी टिस निकालने के लिये जामा मस्जिद को घोड़ों के अस्तबल में तब्दील कर दिया था। फिर 1862 में लाल चुना मल ने चंदा करके अंग्रेजों से मस्जिद वापस दिलाई थी।


अगर जामा मस्जिद के इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो मन को गर्वान्वित करने वाली घटनाओं से मुलाकात हो जाएगी। फिर ऐसी विशाल धरोहर सरकार की उपेक्षा का शिकार क्यों हो रही है?


2006 में सऊदी अरब के राजा अब्दुल्लाह जब भारत आये थे तो जामिया की लाइब्रेरी के अलावा उन्होंने जामा मस्जिद के जीर्णोद्धार के लिए भी चंदा देने की पेशकश की थी इसके लिए सऊदी अरब के आधिकारिक कार्यालय से इमाम अहमद बुखारी के कार्यालय से संपर्क भी किया गया था जिस पर बुखारी ने कहा था हमे कोई आपत्ति नही है मगर हम सीधे तौर पर दान नही स्वीकार कर सकते आप सरकारी माध्यमों के तहत भेज सकते है। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने इसके लिए जरूरी अनुमति नहीं दी और ये पेशकश ठुकरा दिया गया। 1650-56 में बनी जामा मस्जिद का अभी तक पूर्ण रूप से कभी जीर्णोद्धार नही किया गया है।

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आज़ादी के बाद 1948 में हैदराबाद के निज़ाम असफ जहाँ (सातवें) से जामा मस्जिद के एक हिस्से के पुनरुद्धवार के लिए 75000 रुपये माँगे गए थे जिस पर निज़ाम ने 3 लाख रुपये ये कहते हुए स्वीकृत किये के बाकी के तीन हिस्से भी पुरानी नही दिखे। मगर ये भी ऑपरेशन पोलो की भेंट चढ़ गया। फिर 1953 में सय्यद हमीद बुख़ारी के नेतृव में मस्जिद कमेटी से एक दल नेहरू से भी मिला तब नेहरू सरकार ने इसे विशेष स्तिथि बताते हुए इसके लिए बजट में राशि का भरोसा दिया और फिर 1956 में एएसआई की टीम ने जामा मस्जिद में अपना एक कार्यालय खोला था।

तीन दशक तक मामूली मरम्मत के बाद एएसआई ने अपना कार्यालय फिर वहां से बंद कर लिया। तब से अब तक जामा मस्जिद की मीनारे टकटकी लगाए अपनी उपेक्षा देख रही है। गेट नम्बर 3 की मीनार से एक पत्थर तो लॉकडाउन के दौरान गिर भी गया था मस्जिद बंद होने के कारण कोई जानहानि नही हुई थी। हालांकि अब भी गेट नम्बर 3 की मीनारों का पूरी तरह मरम्मत ना हुआ तो कभी भी गिर सकती है।

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रिसाव के कारण कंगूरा (दंतुकार पत्थर) ,जो मस्जिद के ऊपरी हिस्से में रक्षात्मक दीवार बनाता है, कमज़ोर हो गया है टूट कर गिरा भी है फिर भी इसको मामूली तौर पर भी कमेटी ठीक नही करवा पा रही है। दरअसल मस्जिद चुना पत्थर और संगमरमर से बनी है इसलिए मामूली सीमेंट और बालू से इसकी मरम्म्त नही हो सकती है इसके लिए विशेषज्ञों की टीम के देख रेख में ही इसकी मरम्मत संभव है और ऐसी इमारतों के विशेषज्ञ पुरातात्विक विभाग के पास से अच्छा कहाँ मिलेंगे।


इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सांसद पीवी अब्दुल वहाब के जवाब में संसद में संस्कृति मंत्री मीनाक्षी लेखी कहती है “चूंकि जामा मस्जिद संरक्षित धरोहर नहीं है इसलिए पुरातात्विक विभाग इसकी मरम्मत नही कर सकता है”। मगर क्या ये सरकार का दोहरा रवैया नही है। ओड़िशा का पूरी जगन्नाथ मंदिर से लेकर महाराष्ट्र के कई जैन मंदिर की मरम्मत पुरातात्विक विभाग कर चुका है जो कि संरक्षित धरोहर नही थे तो फिर जामा मस्जिद से ये कौन सी खुन्नस सरकार निकाल रही है। अगर विरासत जर्जर हो तो सरकारों को उसे बचाना ही चाहिए फिर चाहे मंदिर हो या मस्जिद इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

मोदी सरकार का जामा मस्जिद की उपेक्षा का क्या एक कारण ये भी है जब नवंबर 2014 में सय्यद अहमद बुखारी के बेटे शाबान बुख़ाति की दस्तारबंदी की गई थी तब इमाम बुखारी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को न्योता भेजा था मगर प्रधानमंत्री मोदी को नहीं, हालाँकि तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह और सय्यद शाहनवाज़ हुसैन जैसे बीजेपी के नेता आमंत्रित किये गए थे और शिरकत भी की थी।

2003 में जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने वाजपेयी सरकार का भी दरवाज़ा खटखटाया था तत्कालीन संस्कृति मंत्री जगमोहन ने बुखारी से ज्ञापन पत्र पर हस्ताक्षर करने का प्रस्ताव दिया जिसमें मस्जिद को संरक्षित धरोहर मानते हुए इसे पुरातात्विक विभाग को सौपने के प्रावधान थे। मगर अहमद बुखारी ने इस प्रस्ताव को ये कहते हुए ठुकरा दिया के इससे विभाग का हस्तक्षेप मस्जिद प्रबंधन में बढ़ जाएगा और भविष्य में विभाग यहाँ नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी भी लगा सकता है। बुखारी की ये आशंका सत्य भी प्रतीत होती है। वर्तमान में सिर्फ दिल्ली में पुरातात्विक विभाग ने सत्तर मस्जिदों में नमाज़ पर पाबंदी लगा रखी है। मस्जिद नमाज़ के लिए बनती है सजोये रखने के लिए नहीं इसलिए बुखारी का निर्णय इस नज़रिये से सही लगता है।

एक के बाद एक सरकार आयी गयी मगर मस्जिद की स्तिथि को ठीक करने का जिम्मा किसी ने नही लिया मस्जिद की स्तिथि हर साल अपने पिछले साल की अपेक्षा बदतर होती जा रही है।

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भारत सरकार को दानशीलता दिखा कर जल्द से जल्द मस्जिद के मरम्मत के लिए पुरातात्विक विभाग को निर्देश देना चाहिए साथ ही मरम्मत के लिए धनराशि आवंटित करना भी ज़रूरी है।


ताकि अगली बार कोई जामा मस्जिद जाए तो मस्जिद की जर्जर भव्यता नहीं सीना ताने मीनारे दिखे, उबड़ खाबड़ फर्श नहीं चमचमाती मज़बूत नीवं दिखे।

यह पोस्ट मोहम्मद शादान अयाज़ ([email protected]) द्वारा लिखा गया है…….

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