what is tax free film?

फ़िल्म की शुरुआत चाहे लुमियर ब्रदर ने फोटोग्राफी कर के सनेमेटोग्राफी के रूप में सामने लाया हो, चाहे भारत की पहली फ़िल्म के रूप में दादा साहेब ने राजा हरिश्चंद्र के रूप में लाया हो या फिर भारत की पहली बोलती फ़िल्म के रूप में 1931 में आलम-आरा को उतारा गया हो। लेकिन इन सब फिल्मों को मोतिव केवल एक था ‘लोगों का मनोरंजन करना’ या फ़िल्म के माध्यम से लोगों को शिक्षा देना। ऐसे में फिल्में हमेशा से लोगों के लिए मनोरंजन का माध्यम रहीं है। चाहे लोग जितना थके हुए हो, हारे हुए हो फिल्में हमेशा उनका मनोरंजन करती हैं। अब ये बात अलग है कि फ़िल्म के कौन से पक्ष का मत आपको अच्छा लगे और कौन से मत या वाक्य को अपने अंदर संजोए या पिरोने क् प्रयास करें।

ऐसे में अंग्रेज़ो ने भी देखा कि इस फील्ड में बहुत पैसा है और उन्होंने इसपर कर लगाना शुरू कर दिया। वैसे अंग्रेज़ो ने फिल्मों पर टैक्स लगाने का कारण यह भी सामने आता है कि, इससे लोगों की भीड़ नहीं लगती है और वही लोग फ़िल्म देखने आ सकते हैं जो आर्थिक या पारिवारिक रूप से थोड़ा सही हैं। जिसके चलते अंग्रेज़ो ने फिल्मों पर एंटरटेनमेंट कर लगाने की शुरुआत की। यह टैक्स अंग्रेज़ो के भारत से जाने के बाद भी लागू रहा क्योंकि इससे राज्य सरकारों को काफी अच्छा मुनाफा मिलता और उनके कमाई का एक अच्छा जरिया भी बना।

2017 के मध्य GST(गुड्स एंड सर्विस टैक्स) के आने से पहले राज्य सरकार के पास यह अधिकार होता था कि वह फिल्मों पर एंटरटेनमेंट कर कितना प्रतिशत लगाए। ऐसे में हर राज्य में टैक्स की दरें अलग अलग होती थी। उदाहरण के रूप में देखें तो जहाँ महाराष्ट्र में 45 फीसद टैक्स किसी व्यक्ति को फ़िल्म देखने के लिए उसे अपने टिकट पर देना पड़ता था, तो वहीं मध्य प्रदेश में यह 30 फीसद और उत्तर प्रदेश में यह 60 फीसद के करीब था।

पर जब 2017 में GST का आगमन हुआ तो कॉरपोरेट घरानों के साथ-साथ इंडस्ट्रीज और हमारे गणित में बहुत ज्यादा परिवर्तन आया। पहले जहाँ टैक्स अलग-अलग राज्य अपने हिसाब से लगाते थे वहीं GST के आने से यह एक देश एक टैक्स के रूप में परिवर्तित हो गया। अब आप चाहे मुम्बई में फ़िल्म देखें या दिल्ली में आप पर टैक्स की दर उतनी ही लगने वाला है।

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शुरुआत में फिल्मों पर 28% कर लगाने का प्रावधान किया गया था पर कॉरपोरेट और इंडस्ट्रीज के कहने पर की यह कर बहुत ज्यादा है और इसे कम किया जाना चाहिए। जिसके तहत इसे 12% और 18% के टैक्स स्लैब में रखा गया है। हम इसकी चर्चा आगे करेंगे…

बेस प्राइस क्या होता है?

बेस प्राइस को अगर आसान शब्दों में समझे तो, यह किसी उत्पाद का एक न्यूनतम लागत है जिसके नीचे किसी उत्पाद को नहीं खरीदा जा सकता है। अब इसे समान्य उदाहरण के रूप में लेते है… एक रेड़ी वाला आपके घर के सामने सब्जियों की दुकान लगाता है जब आप उससे सब्ज़ी खरीदते है तो वह सब्जी आपको 30 रुपए में मिल जाती है पर जब आप वही सब्जी किसी मॉल से खरीदने जाते हैं तो आपको वह सब्जी 50 रुपये मे मिलती है। कारण देखें तो दोनों ही जगह पर एक ही सब्जी मिल रही है पर माल का नाम लग जाने से एक का रेट बढ़ जाता है और दूसरा रेड़ी वाले के साथ कोई टैग नहीं है। यही खिलवाड़ सिनेमा हॉल को लेकर होता है जहाँ लोग सिनेमा हॉल में कम जाते हैं वहाँ टिकेट का मूल्य कम होता है वहीं ज्यादा पौष इलाके में मूल्य ज्यादा होता है.

बेस प्राइस किसी समान या उत्पाद का वह न्यूनतम कीमत है जो किसी उत्पादक द्वारा निर्धारित किया जाता है। ज्यादातर भारत के संदर्भ में देखें तो सरकार न्यूनतम कीमत निर्धारित करती है ताकि उत्पादक के साथ कोई बदसलूकी न हो और वह अपना उत्पाद आसानी से बेच सके।

फ़िल्म के संदर्भ में देखें तो फ़िल्म का रेट उसमें शूट किए जाने वाले लोकेशन, उसमें काम करने वाले एक्टर्स, डायरेक्टर आदि के आधार पर तय किया जाता है।

कहने का तात्पर्य है कि किसी फिल्म का एक बेस प्राइस चयनित कर लिया जाता है, जिसके बाद उसे फ़िल्म एसोसिएशन के साथ डील किया जाता है। कई बार सिनेमा थिएटर के अधिकारी किसी फिल्म के लिए एड्मिसन चार्ज ज्यादा ले लेते हैं पर ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। वास्तव में किसी फिल्म के बेस प्राइस के बाद उसमें फ़िल्म असोसिएशन अपना लोकेशन के आधार पर एक एड्मिसन चार्ज लेते हैं जिसके अंतर्गत वो अपने द्वारा फ़िल्म देखने के दौरान दी जाने वाली सुविधाओं का मूल्य लेते हैं।

ऐसे में किसी फिल्म को आप मुम्बई जैसे राज्य में शहर में स्थित किसी सिनेमा में देखते हैं तो आपको उसका ज्यादा रुपया देना पड़ सकता है। वही अगर आप ऐसे थिएटर में फ़िल्म देखने जाते हैं जहाँ लोग कम आते हैं तो बेशक वह थिएटर मुम्बई में ही क्यो न हो पर उसका रुपया उस व्यक्ति को कम देना पड़ेगा। कहने का तात्पर्य लोकेशन के आधार पर भी फ़िल्म के टिकट का निर्धारण होता है। इसी के साथ एक और कारक है जो फ़िल्म के टिकट के मूल्य में वृद्धि करता है या कमी करता है। वह है डिमांड। अगर डिमांड ज्यादा है तो बेस प्राइस ज्यादा होगा ऐसे में पैसे ज्यादा देने पड़ेंगे वही डिमांड कम है तो बेस प्राइस भी कम होगा ऐसे में पैसे भी कम देने पड़ेंगे।

प्रोड्यूसर्स कैसे फ़िल्म असोसिएशन के साथ गठजोड़ करते हैं

आज जमाना बदल चुका है। ऐसे में फिल्मों को दिखाने का माध्यम भी बदल चुका है। वर्तमान युग मे फिल्में मल्टीप्लेक्स, PVR और सिनेप्लेक्स के रूप में थिएटर में देखी जाती हैं। इनका एक अपना फ़िल्म असोसिएशन होता है जिनके मालिक फ़िल्म प्रोड्यूसर्स से सीधे फिल्में खरीदते हैं या डील करते है।

यह बात ज्ञात होने चाहिए कि जब भी कोई प्रोड्यूसर, कोई फ़िल्म बनाता है तो उसे बजट का पहले से ही एक अंदाजा होता है, जिसके चलते उसे पता रहता है कि उसकी फ़िल्म कितने करोड़ में बनने वाली है या बनी है। उसी पर वह अपना मुनाफा जोड़ता है और थिएटर असोसिएशन से डील करता है। जैसे ही किसी स्टेट ने किसी फिल्म को टैक्स फ्री किया। टिकट का रेट भी कम हो जाता है। ऐसे में ज्यादातर लोग उस मूवी को देखने जाते हैं जिससे प्रोड्यूसर और सिनेमा के मालिकों का अच्छा खासा प्रॉफिट होता है।

जब कोई राज्य किसी फ़िल्म को टैक्स फ्री करता है तो इसका मतलब है कि वह उस फिल्म पर उस राज्य में टैक्स नहीं ले रहा है पर केंद्र सरकार को उसे टैक्स देना ही होगा क्योंकि टैक्स पर छूट राज्य सरकार ने किया है न कि केंद्र सरकार ने।

थिएटर असोसिएशन और प्रोड्यूसर के बीच डील के बवंदल में अटका फायदा

किसी भी फ़िल्म को जब थिएटर असोसिएशन, प्रोड्यूसर से डील करता है तो उसके दो तरीके होते हैं-

  1. आउट राइट
  2. मिनिमम गारंटी

आउट राइट:- मान लीजिए कोई फ़िल्म है और उसके प्रोड्यूसर से उस फिल्म को अपने मुनाफे को देख कर 200 करोड़ में असोसिएशन के बेंच देता है और आगे चलकर वह फ़िल्म 800 करोड़ रुपये की कमाई कर लेती है। ऐसे में 200 रुपये फ़िल्म प्रोड्यूसर के पास जाएगा और बाकी बचे 600 करोड़ का सीधा लाभ उस एसोसिएशन को होगा। उदाहरण के लिए अमेज़न प्राइम पर आई फ़िल्म पुष्पा- द राइज स्टार को जब तमिल भाषा हिंदी में डब किया गया तो इस फ़िल्म को डब करने की पूरी लागत लगभग 22 से 26 करोड़ के बीच पड़ी। जिसकी कमाई 150 करोड़ रुपए से ज्यादा हुई। अब यहाँ पर जो प्रॉफिट हुआ है वह सीधे-सीधे असोसिएशन को होगा।

Minimum गारंटी:- मिनिमम गारंटी के तहत पहले तो फ़िल्म प्रोड्यूसर अपने द्वारा बनाई गई फ़िल्म को असोसिएशन को बेंच देता है, मान लीजिए उसने 100 करोड़ में उस फिल्म को असोसिएशन को बेंच दिया। अब यहाँ दो कंडीशन अप्लाई होगा पहला तो यह कि 100 करोड़ के बाद का जो प्रॉफिट होगा उसमें सिनेमा मालिक और प्रोड्यूसर के बीच एक फिक्स परसेंटेज की डील हो सकती है जिसमें 70 फीसद प्रोड्यूसर और 30 फीसद सिनेमा असोसिएशन को। वहीं दूसरी कंडीशन यह भी हो सकती है कि 60 फीसद सिनेमा मालिक को और 40 फीसद प्रोड्यूसर के पास जाए।

मूवी के लिए GST में दो स्लैब का प्रावधान

वर्तमान समय मे gst को दो स्लैब में विभाजित किया गया है पहला स्लैब है 12% टैक्स का दूसरा स्लैब है 18% टैक्स का। 12 प्रतिशत gst उन टिकटों पर लागू होती है जिनके मूल्य 100 रुपए से कम होते हैं। वहीं 100 रुपए से ज्यादा मंहगे टिकटों पर 18 फीसद कर देने का प्रावधान किया गया है।

अगर राज्य किसी फिल्म को टैक्स फ्री करती है तो वह केवल 50 फीसद ही टैक्स की दर कम करती है शेष 50 फीसद टैक्स जो कि केंद्र सरकार का होता है जनता को देना ही पड़ता है। यानी अगर किसी फ़िल्म के टिकट की कीमत 100 रुपए है तो 12 फीसद के हिसाब से 112 रुपये हुए पर राज्य ने अपना टैक्स माफ कर दिया है ऐसे में केवल 106 रुपये ही उस व्यक्ति को देने पड़ेंगे। बात अलग है कि केंद्र सरकार द्वारा लिए गए टैक्स कई सेवाओं के रूप में राज्य के पास वापस पहुँच जाते हैं।

किसी फिल्म को रिलीज़ से पहले भी टैक्स फ्री किया जा सकता है बशर्ते उसमें समाज के हित में कोई अच्छा संदेश, राष्ट्र गौरव, नेशनल वारियर आदि समाहित हो। उदाहरण के लिए मैरीकॉम फ़िल्म के रिलीज से पहले उसे कई राज्यो ने पहले ही टैक्स फ्री कर दिया था।

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