द्वंद्व से मानव घिरा,
निज जीवन की आश में ,
स्वयं को साध्य अमर्त्य मानता
भौतिकता के आभास में !
अधर आलिंगन में प्रकृति की ,
करता रहा दीदार ,
आत्म-अभिव्यक्ति के अन्तःस्थल में ,
व्यक्त उद्गार का पारावार !
द्वंद्व से मानव घिरा, निज जीवन की आश में !
स्वर्णिम विलास की उत्कंठा से ,
प्रकृति को भी साधन माना ,
उस प्रकृति की विकल करूण ने
मानव को अहसास कराया !
द्वंद्व से मानव घिरा,
निज जीवन की आश में ,
स्वयं को साध्य अमर्त्य मानता
भौतिकता के आभास में !

यह कविता Vivekanand Pandey द्वारा लिखी गई है |

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By Admin

One thought on “मानव का द्वंद्व !”

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