मानव इतिहास में अभी तक जितने भी नवोन्मेष और सृजन हुए हैं  सभी का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन को सरल बनाना रहा है। भौतिक उन्नति के साथ विकास और प्रगति के लिए मानव का स्वस्थ रहना भी जरूरी है ,क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। इसके लिए नियमित अनुशासन वाली दिनचर्या, योग, सैर,  संतुलित खान-पान जरूरी है साथ ही स्वच्छ पर्यावरण का होना बहुत आवश्यक है क्योंकि बढ़ते शहरीकरण में प्रदूषण और भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण हमारी स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ा है।


इक्कीसवीं सदी के बाइसवें साल में हमारे सामने आधुनिकता के साथ ही स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां अधिक हैं, हाल ही में एक अदृश्य शत्रु कोरोना  से दुनिया जिस तरह लड़ रही है यह हमारे स्वास्थ्य तैयारियों  और प्रकृति के दोहन की पोल खोलने के लिए काफ़ी था । देश में अधिकांश शहरों की बेतरतीब नगर नियोजन के कारण लोगों के लिए किसी खुले ,स्वच्छ जगह पर प्रकृति के गोद में बैठना दुरूह है। दिल्ली जैसे महानगर  में दिन के समय चटक  नीला आसमान और रात में तारों से सजे आकाश को देखना किसी चमत्कार से कम नही है ।

मानव जीवन के लिए पर्यावरण का स्वच्छ होना बेहद जरूरी है।


देश राजधानी में करें तो वर्ष भर औसत वायु गुणवत्ता WHO  के आदर्श  मानक (40-60 ) से तीन गुना अधिक रहता है। वाहनों की बढ़ती संख्या, विकास के लिए पेड़ों की कटाई और जन सहभागिता का अभाव, सरकार की उदासीनता इसके प्रमुख कारण हैं। राजधानी में वना-वरण बहुत कम है जिससे यहां वर्षा की कमी और co2 अवशोषण कम होता है।
 

पर्यावरण मंत्रालय की द्विवार्षिक  State of फॉरेस्ट इंडिया रिपोर्ट 2021 के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली के क्षेत्रफल के 13.2% भाग पर वृक्षा-वरण है जो राष्ट्रीय औसत 21.7% से 8.5 % कम है। ध्यातव्य है कि राष्ट्रीय औसत अभी स्वयं 33% के आदर्श आंकड़े से कम है । विकास के लिए अरावली पहाड़ियों के अनुचित दोहन भी एक कारण रहा है जो किसी से छिपा नही है।

 राजधानी में आपको हर मुहल्ले के आस पास सरकार के बनाये पार्क तो हैं लेक़िन उनकी स्थिति भी अच्छी नही है।  Delhi park and garden society के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में कुल 18000 पार्क हैं   जिनका प्रबंधन MCD, DDA और PWD  के द्वारा किया जाता है।

उत्तरी दिल्ली में अभी मैं जिस जगह  पर रहता हूँ वहाँ  क्रिश्चियन कालोनी में mcd का एक पार्क है जिसमें   गंदगी और कूड़े की समस्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। साथ ही कई जगह कूड़े जलाने से प्रदूषक तत्व हमारे वातावरण में घुलकर सांस की कई बीमारियों को जन्म दे रहे हैं। पार्क की नियमित साफ सफाई न होने से इसमें लोग घरों का कूड़ा भी डाल देते हैं और कभी -कभी तो इन कूड़ों में से प्लास्टिक खाने से गायें मर भी जाती हैं।

अभी दिल्ली में mcd का चुनाव है और सभी दलों द्वारा तमाम दावे किए जा रहे हैं लेक़िन चुनाव बीतने के साथ ही लगता है सारे दावे मुंगेरी लाल के हसीन सपने थे। पार्कों की सुध लेने वाला कोई नही है, यहाँ ग़रीब अपने रोज़ी रोटी में , स्टूडेंट्स अपने भविष्य को लेकर तो  तथाकथित प्रबुद्ध अपने भौतिक जीवन और ऐशो-आराम में व्यस्त हैं।