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हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और....

साँवले तो कृष्ण भगवान और श्री राम चन्द्र जी भी हैं, तो हम साँवले होने पर अपने को क्यों किसी से कम समझे। दूसरी बात ये की, रंग देख कर किसी के बारे में, मन मे एक विचार बना लेने वाला व्यक्ति ‘भेड़िये के कपड़े में छुपा हुआ लोमड़ी’ है जिसे केवल और केवल अपने जीवन के सुख सुविधाओं की ही परवाह रहती है।

खैर हम अपने आज के बिंदु पर वापस आते हैं। आज का युग वह युग है जहाँ पर कोई भी व्यक्ति बिना किसी दिक्कत के गर्व से कहीं भी, कुछ भी कर सकता है। जो कि किसी भी व्यक्ति के स्वतंत्र होने के प्रमुख कारण है पर इंटरनेट युग और औद्योगिक विकास में कहीं न कहीं, आज-कल किसी दूसरे रूप में काले-गोरे होने की कहानी चल रही है।

आज रंग-भेद पर, आपको बहुत से पोस्ट गूगल पर मिल जाएंगे जहाँ पर , मानव संवेदनाओं को जगाया जा रहा है, लोगों को बताया जा रहा है कि सावला होना कोई गुनाह नहीं। यह तो एक प्राकृतिक और जेनेटिक क्रिया है। पर मुद्दा ये है कि यही लोग अपने व्हाट्सएप, फेसबुक और कई सोशल मीडिया हैंडल के डीपी के लिए फिल्टर्स का प्रयोग क्यों करते हैं?

क्यों वह सोचते हैं कि उनकी तस्वीर कोई देखे तो उसे लगे कि वह टाइड सर्फ से पूरी तरह धुली हुई है साफ है? क्या उसे अपने रंग पर अभिमान नही है या अभिमान केवल इंटरनेट के लिए है? क्यों वे फ़ोन को खरीदते हुए, ऐसे फ़ोन का चयन करना ज्यादा पसंद करते हैं जिसमें कैमरा क्वालिटी अच्छा हो और जिसमे उनका फेस साफ आए? पर मानव संवेदनाओं से ऐसा छलावा क्यों?

आप सोचिए एक बार क्योंकि यह मुद्दा गंभीर है….

By Admin

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