हाल में हुई क्रिसमस की घटना जिसमे हरियाणा के अंबाला शहर के रेडीमर चर्च में जीसस क्राइस्ट की प्रतिमा के साथ हुई तोड़ फोड़ और जय श्री राम के नारे लगाना , कुछ नौजवान बच्चों द्वारा बनाए गए बुल्ली बाई ऐप, जो एक धर्म विशेष की महिलाओं को टारगेट करता है , इसी के साथ साथ कुछ धर्म धुरंधरों की सामाजिक भावना भड़काने के लिए गिरफ्तारी होना , ये सब एक संकेत है की भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक मुद्दों पर लोगो को कैसे भड़काया जा सकता है और एक ऐसे समाज को कैसे बनाया जा सकता है जो मूल रूप से कट्टरवादी हो । कुछ दिन पहले सामाजिक कट्टरवाद का एक उदाहरण और भी हमारे सामने आया जब राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण (NIA) द्वारा एक ISIS माड्यूल का भांडा फोड़ किया गया था । अन्वेषण से उजागर हुए सदस्यों की भर्ती से लेकर तैयारी तक अतिवाद प्रसारक की अहम भूमिका को देखा जा सकता है।

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भारत के प्रधानमंत्री ने भी ये माना है कि कट्टरता या अतिवाद हमारे देश और विश्व के सभी देशों की सुरक्षा के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस बात को उन्होंने SCO (शंघाई सहयोग संगठन) सम्मेलन में कहा है; और यह भी कहा कि अतिवाद को रोकने के लिए देशों को जल्द से जल्द एक व्यवस्थित और संवैधानिक कदम उठाने की जरूरत है जिसकी अगुवाई भारत करने के लिए तैयार है।

हमें ये समझना होगा कि अतिवाद है क्या और कैसे हम इससे अपने समाज को बचा सकते है।

  परिभाषा:  अतिवाद एक प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति या समूह उग्र राजनीतिक , सामाजिक अथवा धार्मिक विचारधारा को ग्रहण करने लगे , और जो देश की संप्रभुता  अखंडता अथवा एकता को बिगाड़ने की कोशिश करने में रुचि रखे , ऐसी मानसिकता व्यक्ति या समूह को अतिवाद या कट्टरता की तरफ ले जाती है । भारत में बढ़ते हुए मॉब लिंचिन, गाय के नाम पे शोषण , नौजवानों का आतंकी गतिविधि में लिप्त होना और धर्म विशेष के प्रति उग्र होने के मामले इस बात की पुष्टि करते है भारत में अतिवाद बढ़ रहा है जिसे रोकना सामाजिक समृद्धि के लिए जरूरी है।

कारण : अतिवाद एक समाजव्यापी सच है और समाज में इसके तेजी से फैलने के कुछ महत्वपूर्ण कारण भी हैं । उनमें से एक है सोशल मीडिया जिसकी पहुँच वर्तमान में देश के लगभग हर कोने में है और समान विचारधारा के लोगों के लिए ये एक इकोचेंबर प्रदान करता है। ऐसे में इसका कट्टरता के प्रचार में अहम किरदार न हो, मुमकिन नहीं है। वहीं लोगों का बिना विचार किए किसी खबर को मान लेना और आगे बढ़ा देना एक देशव्यापी चिंता का कारण बना हुआ है । अतिवाद को बढ़ावा देने की दूसरे वजह जो है उसमें धार्मिक चरमपंथ को देखा जा सकता है। जिसमें धर्म का इस्तेमाल भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भावनाएं भड़काने और चरमपंथ को बढ़ावा देने के लिए हर संभव रूप से हो रहा है जिसके चलते देश में जगह जगह धर्म के आधार पर भेदभाव , हिंसा और आतंकवाद के मामले भारी मात्रा में सामने आ रहे हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कमजोर और गैर जिम्मेदाराना कानूनी और राजनीतिक प्रक्रिया जिसकी वजह से कट्टर मानसिकता वाले लोगों को और बढ़ावा मिल रहा है जो देश और समाज दोनों के लिए ही हानिकारक है । कट्टरता से निपटने और एक सौहार्द पूर्ण विकासशील समाज बनाने के लिए ये जरूरी है कि सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कदम उठाए जाएं जो अभी तो विस्तारित रूप में नहीं दिख रहा है ।

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निवारण और नीतियां : भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा 2017 में “काउंटर टेररिज्म एंड काउंटर रेडिकलाइजेशन डिवीजन” की स्थापना की , यह विभाग मूल रूप से आतंकवादी रूपी गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए बनाया गया है । इसके अलावा UAPA अधिनियम 1967 और NIA अधिनियम 2008, कानूनी रूप से कट्टरता जैसे विषयों को संबोधित करते हैं।

अतिवाद से निपटने के लिए सर्वप्रथम भारत में एंटी रेडिकलाइजेशन की रणनीति को तत्परता से पूरे देश में लागू करना चाहिए और इस नीति को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए हमें समझना होगा कि कट्टरता हिंसा के रुप में प्रकट होने से बहुत पहले दिमाग और दिल में शुरू हो जाती है । निवारण के रूप में गिरफ्तारी अथवा मुकदमा ही अंतिम प्रावधान ना हो, इसके साथ-साथ व्यक्ति के सुधार और पुनर्वास को भी प्राथिमकता देनी चाहिए। यहाँ हमें समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए धार्मिक समन्वय , संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने और खेल कूद में सम्मिलित करके युवाओं को देश की मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास करना चाहिए ताकि देश अच्छी दिशा में आगे जा पाए।

निष्कर्ष : अतिवाद भारत के आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है और ये समाज के बीच घातक ध्रुवीकरण का काम कर रहा है । इसलिए यह जरूरी है कि हम एक व्यवहारिक और उतरदायी समाज का निर्माण करें,जहॉ॑ जरूरतमंदों और गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा और न्याय का प्रबंध हो ।

कट्टरपंथ तभी समस्या का कारण है जब इससे हिंसा हो, हमारे समाज की ये चुनौती है की हिंसा होने से पहले इसे रोका जाए और इस प्रक्रिया में देश के हर एक नागरिक की ये भूमिका है कि कट्टरपंथ या उससे होने वाली हिंसा को किसी भी रूप में बढ़ावा न दें और इसको जड़ से खत्म करने में सरकार और समाज की मदद करें।

" पहले आए वो कम्युनिस्ट के लिए , और मैं चुप रहा - क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नही था ।                                      फिर आए समाजवादियों के लिए , और मै चुप रहा - क्योंकि मैं समाजवादी नही था ।                                      फिर आए मुस्लिमों के लिए , फिर मैं कुछ नहीं बोला - क्योंकि मैं मुस्लिम नही था ।                                         फिर आए यहूदियों के लिए , मैं फिर कुछ नही बोला - क्योंकि मैं यहूदी नही था ।                                            फिर वो आए मेरे लिए , और तब मेरे लिए बोलने को कोई नही था ।।"   मार्टिन नीमोलर                                                    

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