महाराणा प्रताप सिंह (1540 से 1597) एक महान, शूरवीर और पराक्रमी शासक थे। जो कि मेवाड़ रियासत से संबंध रखते थे। इनका जन्म 9 मई, 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। इनके माता का नाम जयवंता बाई और पिता का नाम राणा उदयसिंह था; महाराणा प्रताप सिंह का पूरा नाम महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया है। अजबदे पवाँर, प्रताप सिंह के पत्नी का नाम था और इनके 16 पुत्र थे। जिनमें बड़े पुत्र का नाम अमर सिंह था। प्रताप सिंह कुल चार भाई थे और प्रताप सिंह की लंबाई लगभग 7.4 फ़ीट थी।

कुछ इतिहासकारों ने ऐसा भी इनके जन्म के संबंध में लिखा है कि, जब महाराणा प्रताप जी का जन्म हुआ था तो उस समय उनके पिता राणा उदय सिंह युद्ध और असुरक्षाओं से घिरे हुए थे, और जैसे ही उन्हें पता चला कि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है; वैसे ही उन्होंने युद्ध जीतना प्रारंभ कर दिया, वे सिसोदिया राजवंश के वंशज और वीर पराक्रमी राजा और देश के प्रति समर्पित थे।

maharana pratap singh
Maharana pratap Singh

राजपुताना राज्यों में मेवाड़ का अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव बप्पा रावल, खुमाण प्रथम, महाराणा हम्मीर, महाराणा सांगा, उदयसिंह और वीर शिरोमणि महाराजा प्रताप ने जन्म लिया है।

महाराणा प्रताप सिंह अपने जीवित रहने के दौरान कभी भी अपने आराध्य देव एकलिंग के शिवाय किसी के समक्ष अपना सर नहीं झुकाया। यह बात इसलिए भी मुख्य है क्योंकि उस समय मुगल सम्राट के समक्ष केवल मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप सिंह को छोड़ कर लगभग सब नतमस्तक हो गए थे। महाराणा प्रताप सिंह ने यह कसम खा ली थी कि “मैं घास की रोटी और जमीन पर लेट जाऊंगा, परंतु किसी की अधीनता को कभी भी स्वीकार नहीं करूंगा।” वह इस कसम को हर कीमत पर अपने जीवित रहने के दौरान निभाने को तैयार थे और इसमें वे सफल भी हुए।

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एकलिंग राणाओं के कुल देवता हैं; जिनका मेवाड़ के इतिहास में बहुत महत्व है। यह मंदिर उदयपुर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 8वीं शताब्दी में मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल जी ने करवाया था, जहाँ एकलिंग के मूर्ति को स्थापित किया गया था।

महाराणा प्रताप सिंह ने अपना बचपन भील लोगों के साथ बिताया था ऐसे में उन्हें भील के लोग कीका कहकर पुकारते थे जो कि एक गुजराती शब्द है और जिसका अर्थ बेटा होता है। महाराणा प्रताप के बारे में माना जाता है कि वे बचपन से ही तलवार और ढाल में पारंगत थे और वे यह अभ्यास भील के अपने उम्र के बच्चों के साथ करते रहते थे।

तलवार और ढाल में निपुढ होने के बाद उनके पिता ने उन्हें आगे की शिक्षा के लिए गुरु राघुवेन्द्र जी के पास भेज दिया, राघुवेन्द्र ने पूर्ण रूप से सारी अस्त्र-शस्त्र की शिक्षाएं प्रताप को प्रदान की और एक ऐसे महान योद्धा को तैयार किया, जिसके समक्ष कोई भी मुकाबला करने में सक्षम नही था। यहाँ तक कि मुगल सम्राट अकबर भी प्रताप के समक्ष आने से बचते थे।

महाराणा प्रताप बचपन से ही बौद्धिक रूप से तेज, शस्त्रों में पारंगत के साथ निपुढ, चतुर और किसी भी परिवेश में तत्परता पर बने रहने की आत्मनिष्ठा में पारंगत थे। ऐसे में उन्हें बचपन से ही प्रजा ने एक राजा के रूप में मान लिया था और धीरे-धीरे वे महाराणा प्रताप के रूप में प्रख्यात हुए।

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक

महाराणा प्रताप के राज्याभिषेक की बहुत ही रोचक कहानी है। असल मे उस समय आस-पास के क्षेत्रों से मेवाड़ को खतरा रहता था जहाँ उस समय प्रथा बन गयी थी कि बड़ा भाई देश की सीमाओं की रक्षा करेगा और उससे छोटा भाई राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। ऐसे में 1572 में राणा उदय सिंह द्वितीय के देहांत होने के बाद नवे नंबर के पुत्र जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाया।

जब राज्याभिषेक होने वाला था तो उस समय कुछ मंत्रियो को महाराणा प्रताप नही दिखे ऐसे में उन्होंने प्रताप के एक भाई से इस बारे में पूछा तो पता चला कि वे आराध्य देव एकलिंग मंदिर में हैं जहाँ से वे बाहर जाने की तैयारी में हैं। ऐसी परिस्थिति में मंत्रियों ने महल में हो रहे कार्यक्रम को वहीं रुकवा दिया और जगमाल को उनके अन्य भाइयों के साथ खड़ा कर दिया। जिससे जगमाल बहुत क्रोधित हुआ और महल छोड़ कर बाहर चला गया। जिसके बाद मंत्रियों ने महाराणा प्रताप का पहला राज्याभिषेक मंदिर के समक्ष पड़े पत्थर पर आसीन करके वर्ष 1572 में 28 फरवरी को गोगुन्दा में किया, लेकिन विधि-विधान के साथ उनका द्वितीय राज्याभिषेक 1572 में ही कुंभगड़ दुर्ग में किया।

इस राज्याभिषेक को जगमाल पचा नहीं पाया और वह अकबर के अधीन चला गया जहाँ उसे राजा अकबर ने जहाजपुर की जागीर सौंप दी।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि महाराणा प्रताप के राजा बनने के चार साल पूर्व ही चित्तौड़ पर मुगल सम्राट का आधिपत्य हो गया था लेकिन मेवाड़ राजकोष न तो चित्तौड़ के वक्त और न ही हल्दीघाटी के युद्ध के वक्त मुगलो के हाथ लगा था क्योंकि ऐसा होने पर मुगलों के तरफ से हो हल्ला अवश्य ही संभावी रूप से हुआ होता जो कि उस समय नही हुआ था।

महाराणा प्रताप के शक्ति का प्रतीक उनका घोड़ा और 208 किलो वजन के हथियार

महाराणा प्रताप को अपने घोड़े ‘चेतक’ पर बहुत मान था और हो भी क्यों न, जब जब भी वे किसी विषम परिस्थितियों में पड़े हो और दुश्मनों के घेरे में आने वाले हो तब-तब चेतक ने अपने साहसिक पराक्रम और मालिक के प्रति अपने निष्ठा को दिखाते हुए उन्हें हमेशा ही हवा के रफ्तार से दौड़ लगाकर संकट से दूर किया था। ऐसा कहा जाता है कि महाराणा प्रताप के भाले का वजन 81 किलोग्राम का था और उनके कवच का वजन कुल 80 किलो के लगभग था। कवच, भाला, ढाल और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो वह वजन कुल मिलाकर 208 किलो का हो जाता था। एक बार मन में सोचिए की वे कितने शक्तिशाली और बलसाली थे।

प्रताप सिंह किसी भी युद्ध पर जाने से पहले या किसी अन्य जगहों पर जाने से पहले मेवाड़ की मिट्टी का तिलक अवश्य लगाते थे और मेवाड़ के एक चुटकी मिट्टी को एक साफे में बाध कर अपने साथ रखा करते थे।

प्रताप के शक्तिशाली होने का प्रमाण दें तो हम देवेर की लड़ाई को साक्ष्य के लिए ले सकते हैं जब कुँवर सिंह ने सुल्तान खा (मुगल की तरफ से) और उनके घोड़े को एक ही प्रहार में दो फाड़ कर दिया था, वो भी केवल एक तलवार की वार से। तलवार की बात आई है तो प्रताप सिंह हमेशा दो तलवार अपने साथ लेकर चलते थे। (इस समय वे गोरिल्ला पद्धति से युद्ध लड़ा करते थे, हल्दीघाटी युद्ध के बाद)।

महाराणा प्रताप और अजबदे पँवार का विवाह

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि महाराणा प्रताप का विवाह बचपन में ही अजबदे पँवार के साथ हो गया था। लेकिन उनके जीवन काल को देखें तो उन्होंने कुल 11 शादियां की थी, जिसके चलते उन्हें 16 पुत्रो की प्राप्ति हुई थी। वह 11 शादियां करने के पक्ष में नही थे पर जब उन्होंने देखा कि अकबर एक-एक कर राजपूतों में विवाह करते जा रहा है और जिसके चलते राजपूत अकबर की मदद करने के लिए विवश है तो उन्होंने अकबर की ही नीत अपनाई और ज्यादा विवाह करना शुरू कर दिया।

चित्तौड़गढ़ का युद्ध

जब चित्तौड़गढ़ पर अकबर ने 1567 में आक्रमण किया तब उनकी उम्र 27 साल की थी। अकबर जबसे गद्दी पर बैठा था तब से उसकी एक ही इच्छा थी कि वह अपने राज्य का राज्यविस्तार करे उसकी सीमाओं को बढ़ाये। ऐसे में उसने इसी सोच के साथ इस किले को भी घेरना शुरू कर दिया, जिसके अंदर उस समय लगभग 8000 राजपूत सैनिक और 40000 किसान मौजूद थे।

अकबर की यह घेराबंदी 20 अक्टूबर से 23 फरवरी 1568 तक लगभग 5 महीने की चली और जिसके चलते उदयसिंह और उनके परिवार को राजमहल छोड़ कर सुरक्षित बाहर निकलना पड़ा क्योंकि इतने लंबे अंतराल तक पानी और खाने की व्यवस्था बंद और घिरे हुए किले में होना नामुमिकन था, ऐसे में अकबर का कब्ज़ा चित्तौड़गढ़ के किले पर हो गया। इसके बाद अकबर ने उदय सिंह के परिवार को ढूढने का भरसक प्रयास किया पर वे उनके हाथ कभी नही आए।

चित्तौड़गढ़ पर अकबर ने उस समय हमला किया था जब ठंड का समय पास आगया था, उस समय देखा जाए तो ज्यादातर युद्ध गर्मी के समय ही होते थे और कोई भी सेना चाहे जितनी ताकतवर क्यो न हो ठंड में युद्ध नहीं लड़ती थी और इसी का फायदा उठाया अकबर ने जिसने एकाएक इस महल को घेर लिया और ठंड से बचाव के लिए उसने बहुत पहले ही अपनी नीति बना ली थी।

वहीं जब राजपूतों ने तंग आकर अपना अंतिम युद्ध लड़ने का निर्णय लिया तो सारी राजपूतानियो ने जौहर कर लिया । अकबर के साथ इस युद्ध मे राजपूतों ने साहस और पराक्रम का एक अद्भुत मिलाप दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

हल्दीघाटी का युद्ध

ऐसा नहीं है कि हल्दीघाटी का युद्ध एकाएक हुआ बल्कि बीबीसी हिंदी के यूट्यूब चैनल के बातों को माने तो अकबर ने 1573 से 1575 तक प्रताप के पास 3 दूत भेजे थे। जिसमें राजा मान सिंह, उनके पिता भगवान दास और अकबर के नवरत्नों में से एक तोडलमल जी थे। अकबर के इन दूतों के भेजने के पीछे का एक कारण यह था कि वे प्रताप के युद्ध कौशल से परिचित थे और वे उनसे किसी भी रूप में संधि करना चाहते थे। पर वे किसी भी रूप में प्रताप सिंह को मनाने में असफल रहे थे।

अब मुगल सैनिकों ने मेवाड़ को सीधा अपने पक्ष में न आते हुए देख अजमेर को अपना केंद्र बनाने का प्रयास शुरू कर दिया और बाद में अजमेर को अपना केंद्र बनाकर वहाँ से युद्ध लड़ना शुरू किया।

यहाँ पर मानसिंह को यह बात पता थी कि वे मेवाड़ की राजधानी उदयपुर तभी पहुँच सकते हैं जब वे हल्दीघाटी के दर्रे को पार कर पाएंगे। लेकिन हल्दीघाटी पूरी तरह से पहाड़ो से घिरा हुआ और दूसरी तरफ जंगल था, जहाँ पर भीलों का शासन था। जब मानसिंह उस दर्रे को पार करने का प्रयास कर रहा था तब भीलों ने छापामार पद्धति से उनपर आक्रमण बोल दिया, जिसके चलते अकबर की सेना में हड़कंप मच गया और वे इधर उधर जाने लगे। लेकिन लंबी सेना के होने के नाते मुगली सेना हल्दीघाटी पहुँचने में सफल हुई और यहीं हुआ एक भयंकर युद्ध, यह दिन 21 जून 1576 का था जब हल्दीघाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20,000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85,000 सैनिक युद्ध मे सम्मिलित हुए थे।

एक दिन चले इस अनिर्णायक युद्ध मे दोनों तरफ से 17,000 सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध की शुरुआती सफलता मुगलो को तब मिली जब वे मेवाड़ के प्रिय हाथी रामप्रसाद, का महावर एक तीर का शिकार हो गया। इस घटना के समय तक महाराणा को लगभग 3 घंटे से ज्यादा समय युद्ध लड़ते हुए हो गया था और हाथी के सूंढ में लगी तलवार से चेतक के पैर घायल हो गए थे। जिसके चलते मुगल के सैनिक उनपर ज्यादा वॉर करने लगे। इन सब को ध्यान में रखते हुए राणा के मंत्रियों महाराणा प्रताप सिंह को युद्ध भूमि से बाहर जाने की हिदायत दी और उनकी जगह पर मानसिंह झाला को दे दी ताकि मुगलो को भ्रमित किया जा सके और राजा को बचाया जा सके। ताकि वे आगे भी युद्ध को जारी रख सकें और ऐसे मानसिंह झाला ने मुकुट पर लगी राजश्री छतरी को पहन लिया और मेवाड़ के लिए अपने जान की आहुति दे दी। वहीं ‘चेतक’ ने हवा की गति से महाराणा प्रताप को सुरक्षित स्थान तक, चोटिल होने के बावजूद ले गया जहाँ उसकी मौत हो गयी।

हल्दीघाटी युद्ध के बाद

इसके बाद महाराणा प्रताप का ज्यादा समय जंगलों और पहाड़ों में व्यतीत होने लगा और उन्होंने कसम खाया की जब तक मेवाड़ उनके पास नही वापस आजाता तक तक वे जंगलों में ही रहेंगे, उस समय उन्होंने अपने युद्ध करने की रणनीति को बदल दिया और वे भील की ही तरह छापामार युद्ध करने लगे। जिसमे अकबर के सैनिकों को काफी नुकसान पहुँचाया क्योंकि किसी को पता नही होता था कि कब वे कहा से हमला कर दे, ऐसे में युद्ध के सैनिक भयभीत रहने लगे थे। इसके बाद देवेर कि लड़ाई के बाद प्रताप सिंह ने सुनियोजित 36 छावनियों को नष्ट किया।

जिस समय वे मुगलों से गोरिल्ला युद्ध कर रहे थे और उनकी छावनियों को नष्ट कर रहे थे उस समय उनके बड़े बेटे अमर सिंह अजमेर के गवर्नर खाने-खाना के परिवार की महिलाओं और बच्चो को बंदी बना लिया था। ये खाने खाना कोई और नही बल्कि हिन्दी के मशहूर कवि रहीम जी थे। पर प्रताप को जब यह बात पता चली तो वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने अपने दूत भेजे जिसमे उन्होंने खाने खान के परिवार को छोड़ने को कहा और अमर सिंह को अपने संस्कार के बारे में बताया। अब्दुल रहीम काले खा के इस दया दृष्टि से बहुत प्रभावित हुए थे।

बाद में मेवाड़ के गौरव भामाशाह के द्वारा महाराणा प्रताप के चरणों मे अपनी समस्त संपत्ति दान दे दी। जिससे महाराणा ने पुनः अपने सेना को तैयार किया जहाँ शुरुआती दौर में चित्तौड़ को और मांडलगढ़ को छोड़ कर कुंभलगढ़, केलवाड़ा, गोगुन्दा, उदयपुर को आज़ाद करवा करवा कर सम्पूर्ण मेवाड़ पर पुनः स्थापित हुए।

इसके बाद भी मुगलों और राणा के सैनिकों के बीच छोटे मोटे युद्ध होते रहे पर जीवित रहने के30 वर्ष की अवधि में कभी भी अकबर महाराणा प्रताप को न बंदी बना सका और न ही झुकने के लिए मजबूर कर सका।

महाराणा प्रताप सिंह की मृत्यु

1596 में शिवार खेलते हुए महाराणा प्रताप को चोट लग गयी, जिससे वे कभी भी नहीं उभर पाए। 19 जनवरी 1597 को मात्र 57 वर्ष की आयु में चवाड़ में उनका देहांत हो गया। जिस समय उनका देहांत हुआ उस समय अकबर लाहौर में थे और यह खबर अकबर को उनके दरबारी ने दी।

महाराणा प्रताप सिंह के बाद अकबर की प्रक्रिया

अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी लड़ाई केवल उनके सिद्धान्तो के कारण थी। एक अकबर थे जो अपने राज्य का विस्तार करना चाहते थे और एक अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए कार्यरत थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु से अकबर को बहुत दुख हुआ था क्योंकि हृदय से वे प्रताप के गुणों के, बौद्धिकता के प्रशंसक थे और अकबर को पता था कि महाराणा प्रताप जैसा वीर उस समय इस धरती पर कोई नही है। यह समाचार सुनकर अकबर रहस्यमय तरीक़े से मौन हो गया और उसके आखों में आँसू आगए थे।

अकबर ने कहा कि महाराणा प्रताप के पास साधन सीमित होने पर भी दुश्मन के सामने सर नतमस्तक नहीं किया और जंगल के कंदमूल खा कर वे दुश्मनों से लड़ते रहे।

अकबर के राणा प्रताप की मृत्यु पर शब्द:- ‘महाराणा ने धन और भूमि को छोड़ दिया , पर उसने कभी अपना सर न झुकाया। हिंदुस्तान के राजाओं में वही एक मात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है।’

अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-

अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी
गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी
नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली
न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली
गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी
निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी

कहा जाता है कि अमर सिंह महाराणा प्रताप से भी ज्यादा शक्तिशाली और युद्ध कौशल में निपुढ राजा साबित हुए थे पर राज्य में भुखमरी के चादर ने जब डेरा डाल लिया और जनता का बुरा हाल होने लगा तो अमर ने अकबर के साथ एक संधि की थी जिसमे उन्होंने अकबर को कुछ शर्तों के साथ इस संधि को पूरा किया था, ताकि वह अपने राज्य राज्य की जनता को हर तरीके से ध्यान रख सके।

मदद ली गयी:- गूगल विकिपीडिया से(Access date:- 28 december 2021), बीबीसी हिंदी के यूट्यूब चैनल से।

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