पौराणिक कथा के अनुसार एक बार कैलाश पर्वत पर मां पार्वती और शिवजी साथ बैठे हुए थे और एक दूसरे का मजाक कर रहे थे। मजाक में ही शिवजी ने मां पार्वती को काली कह दिया। माँ पार्वती को बहुत बुरा लगा और वह कैलाश पर्वत छोड़ कर वन में चली गयी और घोर तपस्या में लीन गईं। इस बीच भूखा शेर माँ पार्वती को खाने की इच्छा से वहाँ पहुँचा, लेकिन वह नजदीक जाकर चुप चाप बैठ गया।

माता के प्रभाव के चलते वह शेर भी तपस्या कर रही माँ के साथ वहीं सालों चुप बैठा रहा। माँ ने जिद कर लिया था कि जब तक वह गोरी नहीं हो जाएंगी तब तक वह यहीं तपस्या करेंगी। तब शिवजी वहां प्रकट हुए और देवी को गोरा होने का वरदान देकर चले गए। फिर माता ने नदी में स्नान किया और बाद में देखा कि एक शेर वहाँ चुपचाप बैठा माता को ध्यान से देख रहा है।

देवी पार्वती को जब यह पता चला कि यह शेर उनके साथ ही तपस्या में यहाँ सालों से बैठा रहा है तो माता ने, प्रसन्न होकर उसे वरदान स्वरूप अपना वाहन बना लिया। तब से माँ पार्वती का वाहन शेर हो गया।

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