हिंसा एक ऐसा घोर अपराध है जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। यहाँ हिंसा से तात्पर्य किसी पर मनचाहा दबाव बनाना, अपने शक्तियों का गलत प्रयोग करना, प्रताणित करना, शोषण करना आदि से है।

वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की परिभाषा के अनुसार हिंसा की परिभाषा को समझें तो इसके अनुसार, हिंसा "स्वयं के विरुद्ध, किसी अन्य व्यक्ति या किसी समूह या समुदाय के विरुद्ध शारीरिक बल या शक्ति का साभिप्राय उपयोग है, चाहे धमकी स्वरूप या वास्तविक, जिसका परिणाम या उच्च संभावना है कि जिसका परिणाम चोट, मृत्यु, मनोवैज्ञानिक नुकसान, या कुविकास के रूप में होता है", हालांकि संगठन यह स्वीकार करता है कि इसकी परिभाषा में "शक्ति का उपयोग" शामिल करना शब्द की पारंपरिक समझ को बढ़ाता है। (Wikipedia, access date:- 22 September 2021).

वहीं घरेलू हिंसा से तात्पर्य ऐसी हिंसा से है जिसमें हिंसा, घर के अंदर, परिवार या सहयोगियों से किसी बात, कार्य आदि को लेकर होती है। पर हिंसा के मुख्य शिकार के रूप में देखा जाए तो आज भी महिलाएं या कहें छोटे बच्चे, ज्यादा होते हैं। इसका कारण हम ज्यादातर पितृसत्ता को कह सकते हैं जिसने लंबे समय से अपने स्वामित्व, अपने हित, लाभ आदि के लिए परिवार पर अपने शक्ति का प्रयोग करते है। यहाँ ये बात ध्यान रखना चाहिए कि, शक्ति का प्रयोग अगर परिवार के हित में है और उसका लाभ उस परिवार को होने वाला है तो उस शक्ति को गलत तब तक नहीं माना जा सकता जब तक, वह शक्ति केवल अपने लिए न प्रयोग करने लगे।

अब हम घरेलू हिंसा को आज के संदर्भ से जोड़कर देखते है। अफगानिस्तान में 15 अगस्त 2021 को तालिबान ने अपना आधिपत्य जमा लिया और अपना राज्य काबिल कर लिया। अब आप कहेंगे कि तालिबान के घरेलू हिंसा से क्या तात्पर्य… तो हम आपको बता दे कि तालिबान के आते ही महिलाओं पर एक बार अपने अस्तित्व की स्वतंत्रता को लेकर एक बार फिर डर गहरा गया है, जैसा डर उन्हें 1996 में तालिबान द्वारा अफगानिस्तान के कब्जे को लेकर था और जो 2001 में अमेरिकी सैनिकों के आगमन से खत्म हुआ था और दूसरा महिलाएं किसी भी देश, जाति आदि की हो महिलाओं की स्वतंत्रता का हर जगह रखा जाना चाहिए और रखा जाता भी है । अब हम ज्यादा विस्तार में नही जाएंगे पर तालिबान के पुनः आगमन के दौरान, फिलहाल अभी तक के प्राप्त समाचार से यह पता लगा है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार महिलाओं को मुख्य भूमिका में देखना नहीं चाहती, वह उन्हें घर मे रह कर घर के काम और केवल बच्चे पैदा करने की वस्तु मानती है। अभी आईपीएल 2021 के प्रसारण को अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने यह कहकर बैन कर दिया है कि इस खेल में महिलाएं भी स्टेडियम में हैं जो उनके कानून के तहत नहीं है।

अब एक बात समझ मे आ जाना चाहिए कि अगर आप महिला को घर में रहने का सामान मान लेते हैं और उसके बाहर जाने के अधिकार को अपने इच्छा अनुसार सीमित कर देते हैं तो यह बेशक आपको न लगे कि हिंसा है पर, यह एक अदृश्य हिंसा है जो महिलाओं पर किया जा रहा है। उन्हें अपने मनपसंद चीजों को करने के लिए किसी और कि आज्ञा लेनी पढ़ रही है।

आपने उदाहरण तो पढ़ लिया पर क्या आपने कभी अपने आस पास हो रहे ऐसे घरेलू मामलों को होते हुए सुना या देखा हैं या ज्यादा दूर न जाकर आपने अपने घर मे हो रही हिंसा और उसके कारण को देखा व समझा है।

क्या आपने देखा है कि कैसे घरेलू हिंसा ने विकराल रूप लेकर घर को जहन्नुम बना दिया हो। अगर देखा है तो आपने यह सोचा है कि उसमें गलती किसकी है? क्या उस मामले में सबकुछ ठीक किया जा सकता था? इन सब बातों को सोचते हुए यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी समय एक पक्ष गलत या सही हो सकता है।

वैसे देखा जाए आज के इस 21वी शताब्दी में घरेलू हिंसा में बहुत कमी आयी है जिसका पहला मुख्य कारण कहें तो पढ़े-लिखे लोगों की संख्या में बढ़ोतरी और लोगों द्वारा अपने संकीर्ण सोच को पीछे छोड़ना है। पर इसका मतलब ये कहीं नहीं है कि अब घरेलू हिंसा नहीं हो रही है। आज भी पिछले छेत्रों यहाँ तक कहीं-कहीं पढ़े लिखे तबकों में भी हिंसा होने की घटनाएं सामने आती ही रहती हैं।

हिंसा को हम तीन श्रेणियों में बात सकते हैं:- स्व-निर्देशित हिंसा, अन्तरवैयक्तिक हिंसा, सामूहिक हिंसा और हिंसक क्रियाएं शारीरिक, यौन, मनोवैज्ञानिक या भावनात्मक रूप में हो सकती है। घरेलू हिंसा को हम तीनों श्रेणियों में रख सकते हैं और इसमें चारो प्रकार की हिंसक क्रियाएं सम्मिलित हो सकती है।

हमारे संविधान में महिलाओं के प्रति महिलाओं के इतिहास को देख कर संवेदन शील रवैया अपनाया गया है जिसमें महिलाओं को प्रथम स्थान पर रखा गया है। 2005 में इसी को देखते हुए घरेलू हिंसा के विरुद्ध महिला संरक्षण अधिनियम 2005 बनाया गया जिसमें प्रतिवादी का कोई बर्ताव , भूल या किसी और को महिला की जगह काम करने के लिए नियुक्त करना, सम्मिलित किया गया है, जिसके तहत:-

● क्षति पहुँचाना या जख्मी करना या पीड़ित व्यक्ति को स्वास्थ्य, जीवन, अंगों या हित को मानसिक या शारीरिक तौर से खतरे में डालना या ऐसा करने की नीयत रखना और इसमें शारीरिक, यौनिक, मौखिक और भावनात्मक और आर्थिक शोषण शामिल है; या
● दहेज़ या अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध मांग को पूरा करने के लिए महिला या उसके रिश्तेदारों को मजबूर करने के लिए यातना देना, नुक्सान पहुँचाना या जोखिम में डालना ; या
● पीड़ित या उसके निकट सम्बन्धियों पर उपरोक्त वाक्यांश (क) या (ख) में सम्मिलित किसी आचरण के द्वारा दी गयी धमकी का प्रभाव होना; या
पीड़ित को शारीरिक या मानसिक तौर पर घायल करना या नुक्सान पहुँचाना आता है।

शिकायत किया गया कोई व्यवहार या आचरण घरेलू हिंसा के दायरे में आता है या नहीं, इसका निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्य विशेष के आधार पर किया जाता है।

निष्कर्ष के रूप में कहें तो आज के इस आधुनिक युग मे महिलाओं और पुरुषों को एक ही तराजू में रख कर न्याय करना चाहिए। आज कोई भी व्यक्ति चाहे महिला हो या पुरुष, दोनों ही अपने अधिकार के लिए सक्षम और पर्याप्त हैं और दोनों ही एक दूसरे का शोषण कर सकते हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के तथ्यों, सबूतों आदि को ध्यान में और सामने रखकर कोई फैसला लेना चाहिए। जो कि किया जा रहा है। हम यह नहीं कहते कि महिलाओं का शोषण नही हुआ है और हम उस इतिहास के कालखंड को लेकर शर्मिन्दा हैं, पर आज के आधुनिक युग मे जहाँ प्रत्येक लिंग को आगे बढ़ने मौका दिया जा रहा और वे उच्च स्थान पर पहुँच भी रहे हैं तो ऐसे में पुराने राग को रागना गलत है। बुरी चीज घटित होने में समय नही लगता पर अच्छे चीज को होने में समय लग जाता है इसलिए हर वह व्यक्ति जो आगे बढ़ना चाहता है पर उसके अधिकारों का दोहन हो रहा है तब, उसे अपने अधिकारों के लिए मांग करनी चाहिए और किसी भी कीमत पर जायज मांग पर पीछे नही हटना चाहिए। ये चीजें जब पूर्ण रूप से सामने आएंगी तभी घरेलू हिंसा को खत्म किया जा सकता है। नही तो संकीर्ण सोच वाले किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने देंगे। हमें आज़ादी ऐसे ही नहीं मिली हमनें उसके लिए लड़ा है इसी प्रकार जायज मांग के लिए लड़ना हमारा हक़ है और किसी भी रूप में हमे इसको नहीं छोड़ना चाहिए।

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