जिस प्रकार प्रत्येक समाचार पत्र में एक प्रमुख समाचार पृष्ठ होता है, उसी प्रकार प्रत्येक समाचार पत्र में संपादकीय पृष्ठ भी होता है। संपादकीय पृष्ठ सामान्य रूप से समाचार पत्र के बीच में होता है। अगर देखा जाए तो हम कह सकते हैं कि अगर समाचार पृष्ठ समाचार की खिड़की के रूप में काम करता है तो संपादकीय पृष्ठ समाचार पत्र की आवाज है। यह पृष्ठ केवल समाचार पत्र के स्वामियो के संकीर्ण हितों तथा उसके संपादन की पूर्व धारणाओं के संबंध का केवल एक माध्यम मात्र के रूप में नहीं, वरन, संपूर्ण समाचार पत्रिका को प्रतिबिंबित करने का काम भी करता है। इस पृष्ठ में जो भी सामग्री सम्मिलित की जाती है वह औसत पाठकों की रूचि के दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर और उनको आधार मानकर किया जाता है। अनेक पाठक ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें, इस पृष्ठ को पढ़ने का महत्व ही नहीं पता, और एक अच्छा संपादक इस बात से भली-भांति परिचित होता है। ऐसे में वे अपने लेख इस प्रकार से लिखता है और तैयार करता है, जिससे उसे जनमत निर्माण के कार्य में आसानी हो और इसी के साथ-साथ ऐसे व्यक्तियों को भी प्रभावित कर सकें जो उनके नीति के संदर्भ को वास्तविक रूप से समझना व उसका क्रियान्वयन करना चाहते है।

आज देखें तो संपादकीय पृष्ठ की संरचना का, एक सुव्यवस्थित परंपरा विद्यमान है। आज किसी भी अच्छे संपादकीय संरचनात्मक आधार के लिए प्रायः परंपरागत रूप में यह मान्यता है कि, संपादकीय लेख पांच सौ से साढ़े सात सौ शब्दों से, अधिक नहीं हो और दूसरी महत्वपूर्ण संरचनात्मक बात कहें तो यह है कि संपादकीय, सदैव स्पष्ट, सुलभ एवं सरल भाषा में ही हो। इसके साथ यह बात भी गांठ बांध लेनी चाहिए कि,पाठक की उत्सुकता न तो संपादक के जीवन दर्शन में, न ही उसके विचार के आध्यात्मिक पक्ष में और न ही किसी समस्या के विवेचन करने में। यानी पाठक पर किसी भी रूप से दबाव बनाना स्वयं के विभाग और अपने लिए हानिकारक हो सकता है।

एक अच्छे संपादकीय पृष्ठ की संरचना निम्न प्रकार से की जा सकती है:-

  1. समाचार या समस्या की समीक्षा
  2. संपादकीय टिप्पड़ी
  3. हास्-परिहास
  4. व्यंग-विनोद
  5. संदर्भ सामग्री
  6. पुस्तक समीक्षा
  7. पाठकों के पत्र
  8. अग्रलेख

समाचार या समस्या की समीक्षा:- प्रतिदिन नेताओं के भाषण, राष्ट्रीय स्तर पर वक्तव्य, अंतर्राष्ट्रीय समझौते आदि के समाचार प्रकाशनार्थ आते हैं। इनको समझाने के लिए संपादक समीक्षा करते हुए या समस्या की आलोचना प्रत्यालोचना करता है। कई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के संबंध में, विश्लेषण कर उनके औचित्य-अनौचित्य पर प्रश्न उठाकर, किसी पत्र का संपादक अपने पाठकों के लिए लोक शिक्षण की व्यवस्था का प्रबंध भी कर सकता है।

संपादकीय टिप्पणी:- संपादकीय लेख के अतिरिक्त अन्य तत्सम्बन्धी समस्याओं, सामाजिक रूप में तथ्यों की स्पष्टता , क्षेत्रीय, प्रांतीय एवम रास्ट्रीय स्तर पर चलने वाले आंदोलन, मालिक-श्रमिक संघर्ष, कमजोर वर्ग पर होने वाले अत्याचारों, बाल मजदूरों, युवा वर्ग की विविध समस्याओं आदि पर गहन और व्यापक किंतु संक्षिप्त और सारपूर्ण टिप्पड़ियां, संपादक या सम्पादक के आग्रह पर सहयोगियों द्वारा लिखे जा सकते है।

हास-परिहास:- संपादकीय पृष्ठ की संरचना में हास परिहास का स्तंभ स्थाई रूप से लिखा जाता है और यह संपादक के अतिरिक्त, किसी सहयोगी की लेखनी से ही नियमित और स्थाई रूप में जारी रहता है। किसी विशिष्ट सामयिक समस्या या सांसद में होने वाली चर्चाओं की गंभीर विवेचन के स्थान पर हास-परिहास शब्दों में उन परिस्थितियों और भावी आशंकाओं पर, ये टिप्पणियां पाठकों का मनोरंजन करती हैं।

व्यंग-विनोद:- हास-परिहास के स्तंभ के अतिरिक्त इसी संपादकीय पृष्ठ पर व्यंग्य विनोद स्तंभ भी दैनिक पत्र में दिया जा सकता है। साप्ताहिक पत्रों में देखें तो यह प्रायः अंतिम पृष्ठ पर ही जाता है। इस स्तंभ का लेखक संपादक, व्यंग परक शब्दावली में सामयिक प्रश्नों, समस्याओं पर लेखनी करता है।

संदर्भ सामग्री:- किसी भी समाचार पत्र का कार्य विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को अपने पाठकों तक पूर्ण रूप से पहुँचाना आवश्यक होता है। यह वस्तुतः तत्कालीन समस्याओं से उत्पन्न स्थित के समय, जनसाधारण के आग्रह करने पर तथा किसी स्थित विशेष का पर्दाफास करते समय, संदर्भ से स्पष्ट करने के लिए सारी सामग्री का चयन कैसे किया गया आदि का ध्यान रखकर और सामान्यतः सूचनात्मक रखकर स्थायी रूप से इस स्तंभ को चलाया जाता है| अथवा, ये कार्य स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा , जो अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, उनसे इस स्थायी स्तंभ के लिए सामग्री प्राप्त की जाती है। संस्कृतिक क्षेत्र ,नृत्य, गायन, वादन, रंगमंच पर समीक्षाएं , फ़िल्म चर्चाएं स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा ही ज्यादातर लिखाई जाती हैं।

पुस्तक समीक्षा:- यह एक ऐसा स्तंभ है जो प्रतिदिन दैनिक समाचार पत्र में न जाकर सप्ताह के एक बार, रविवारी अथवा निर्धारित दिन विशेष में स्थायी रूप से जाता है। इसके लिए यह कदापि आवश्यक नहीं है कि समीक्षाकार पत्र या पत्रिका का, वेतनभोगी संपादकीय विभाग का सहकारी हो, और न ही यह आवश्यक है कि कार्यरत संपादकीय सहकर्मी, साहित्यिक विधाओं, इतर-विधाओं तकनीकी, दार्शनिक , मनोवैज्ञानिक पुस्तक की समीक्षा करने में सफल हो।

पाठकों के पत्र:- किसी भी समाचार पत्र में संपादकीय, संपादकीय टिप्पणियों अथवा प्रकाशित समाचार पर पाठकीय प्रतिक्रिया का परिचय देना स्वस्थ्य पत्रकारिता का अंग है, अंतः संपादकीय पृष्ठ एक स्थाई स्तंभ ‘पत्र मिला’ , ‘पाठकों के पत्र’ , आदि नामों से प्रकाशित किये जाते हैं।

अग्रलेख:- समाचार पत्र में संपादक द्वारा किसी ज्वलंत विषय पर लिखे गए लेखों को अग्रलेख कहते हैं। वैसे अधिकांश पत्र प्रातः कालीन संपादकीय बैठक में विषय निर्धारित कर लेते हैं या उस विषय विशेष से सम्बंधित पत्रकार या संपादक, अपने सहयोगी संपादक सह कर्मियों से भी अग्रलेख लिखने का आग्रह कर सकते हैं।

संपादकीय पृष्ठ की विशेषताएं

  • समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ में सामान्यता दो या तीन विशेष लेख, संपादक के लिए पत्र, एक हस्तांतरित स्तंभ और संपादकीय लेख संबंधी विषयों का समावेश होता है। यह पृष्ठ पूर्णतया विचारों और अभिव्यक्तियों का पृष्ठ होता है। इसमें प्रचलित रुचि के विभिन्न विचार प्रकाशित किए जाते हैं।
  • संपादकीय पृष्ठ एक सार्वजनिक मंच होता है जहां प्रत्येक पाठक को अपने विचार रखने का पूर्ण अधिकार होता है और समय-समय पर पाठकों के विचारों को इस पृष्ठ पर प्रकाशित किया जाता है।
  • समाचार पत्र के अंतर्गत सभी प्रकार के मतों को स्थान दिया जाना चाहिए और दिया भी जाता है, भले ही वह समाचार पत्र की नीति के विरुद्ध ही क्यों ना हो।
  • समाचार पत्र के पृष्ठ के रचनाकार को संपन्न करने के लिए प्रचलित रुचि और समसामयिक घटनाओं के विषयों पर प्रख्यात लेखकों के लेख से, लेख प्राप्त किए जाते हैं या इस कार्य को करने के लिए समाचार पत्र के कार्यालयों में ऐसे लेखकों तथा संपादकों एवं पत्रकारों की नियुक्तियां की जाती है।
  • संपादक के नाम भेजे गए पत्र संपादकीय पृष्ठ के महत्वपूर्ण अंग होते हैं पत्र लिखने वाला व्यक्ति अत्यंत साधारण विषय से लेकर अत्यंत गंभीर विषय पर पत्र लिख सकता है वह अपने पत्र में किसी भी बात के बारे में संपादक को अवगत करा सकता है।
  • समाचार पत्र के अंतर्गत केवल उन्हीं पत्रों को प्रकाशित किया जाता है जिनका कुछ महत्व हो और जो प्रकाशन के योग्य है।
  • समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद ही सामग्री को प्रकाशित किया जाना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा पृष्ठ होता है जो कि पूरे समाचार पत्र की रीढ़ की हड्डी का कार्य करता है।

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