अखंड भारत के टुकड़ों में विभाजित होने का एक मात्र कारण है हिंदू संस्कृति का लोप।

यह समझने के लिये सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक है कि

१) भारत की परिभाषा क्या है?
२) अखंड भारत का अर्थ क्या है?
३) भारत के विरुद्ध खड़े होकर इसे तोड़ने वाले कौन से बल हैं?

आइये हम एक-एक कर के इसे समझते हैं।

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भारत की परिभाषा

कोई भी देश केवल लोगों का समूह मात्र नहीं होता। किसी भी देश की परिभाषा यह बताती है कि क्यों उसके नागरिक एक सम्मिलित पहचान के प्रति निष्ठा रखते हैं। अतः भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अग्रणी नायकों ने बारंबार यह प्रश्न किया कि हमारे देश का आधार क्या है।

इस संदर्भ में कई मत उभरे है।

कुछ का मानना था कि भारत अपने इतिहास में कभी भी एकजुट नहीं रहा है और चूंकि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक मुकुट के आधिपत्य में लाने का श्रेय अंग्रेजों को जाता है, तो स्वतंत्र भारत अंग्रेजी साम्राज्य का उत्तराधिकारी ही हो सकता है। हालांकि अंग्रेजों से पहले भी ऐसे सम्राट हुए हैं जिन्होंने पूरे भारत पर राज किया लेकिन इस मत के लोग अंग्रेजी राज्य को ही श्रेय देते हैं।

कुछ मानते थे कि भारत को उसकी एकता किसी राजा, सम्राट, चक्रवर्ती से न मिलकर भारत की सभ्यता और संस्कृति से मिलती है। और चूंकि संपूर्ण भारत की सभ्यता और संस्कृति हिंदू है तो हम सब स्वतः एक हैं। हिंदुत्व विचारधारा में यह परिभाषा मानी जाती है।

किंतु कई विचारक संशय में थे। उस समय अंग्रेजों ने आर्य आक्रमण की मिथ्या कल्पना को सच बना रखा था और इस पर विश्वास करने वाले भारत को सदैव विभाजित मानते थे। ऐसे लोग आज भी हैं और उनकी मनोदशा आज भी ऐसी ही है।

अधिकतर मुस्लिम नेता मुस्लिमों को हिंदू संस्कृति का हिस्सा नहीं मानते थे और इस कारण हिंदू संस्कृति के उदय से उन्हें डर लगता था। वे ‘उम्मा’ में विश्वास करते थे और इनमें से कई नेता मुस्लिम लीग के रूप में मुस्लिमों के लिये एक नया देश बनाने की जुगत में लगे थे।

स्वतंत्रता के समय विभाजन हुआ। पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान बनने का आधार थी मुस्लिम नेताओं का दो-कौमी नजरिया – “मुस्लिम गैर-मुस्लिमों के शासन में नहीं रह सकते।” किंतु कांग्रेस विभाजन की संभावना को अंत समय तक नकारती रही थी। विभाजन के दौरान घटित भयानक हिंसा से गांधी और कांग्रेस को डर लगा कि यदि भारत में हिंदू का उदय हुआ तो इसका प्रतिशोध लिया जायेगा। गांधी की तो हत्या हो गयी। किंतु कांग्रेस ने इस डर से हिंदू संस्कृति को दबाया जो बाद में मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति में बदल गया।

आज सभी प्रयासों के बावजूद हिंदू उदित होता दिखता है। और आज हम भारत को उसी तरह परिभाषित करना चाहते हैं जैसे कभी सावरकर ने किया था –

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः॥

समुद्र के उत्तर में और हिमाद्री के दक्षिण में स्थित देश (वर्ष) का नाम भारत है और यहाँ निवास करने वाले भारतीय है। (विष्णु पुराण)

अखंड भारत

जो लोग यह मानते हैं कि अंग्रेजों के पहले भारत का कोई अस्तित्व ही नहीं था, वे अखंड भारत जैसे विचार को मान ही नहीं सकते। वैसे भी उनकी परिभाषा अंग्रेजों के काल का आविष्कार प्रतीत होती है।

हिंदुत्व द्वारा प्रचारित भारत की परिभाषा के अनुसार यह मायने नहीं रखता कि इतिहास में किसी समय भारत कितने राजाओं के बीच बँटा हुआ था। यदि कश्मीर से कन्याकुमारी तक और सिंध से अरुणाचल तक हमारी संस्कृति एक थी तो हम एक थे। अर्थात् हम सदैव एक थे।

और यदि सांस्कृतिक एकता की ये सीमायें इससे आगे जाती हैं तो वह सारी भूमि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की भूमि कही जायेगी।

हिंदू सभ्यता से जुड़े चिह्न अजरबैजान से लेकर चीन और फिलिपींस तक मिलते हैं। स्वस्तिक का चिह्न पूरे विश्व में मिलता है। हिटलर ने जर्मनी में मिलने वाले प्राचीन चिह्न हाकेन्क्रूज (शाब्दिक अर्थ – टेढ़ा क्रॉस) का प्रयोग किया था जो स्वस्तिक जैसा दिखता है। पूर्वी यूरोप के रोमा लोगों की आनुवांशिकी भारतीय है। तो क्या उनके देशों को अखंड भारत बता दें?

नहीं। हम भारतीय संस्कृति के फैलाव और प्रभाव पर शोध कर सकते हैं और शोध के आधार पर भारत से दूर हो चुके भारतीयों से संपर्क साध सकते हैं किंतु हिमालय और हिंद महासागर ही अखंड भारत की सीमा होगी।

सामान्यतः यह मानचित्र अखंड भारत का बताया जाता है। किंतु यहाँ लद्दाख की ऐतिहासिक सीमाओं का ध्यान नहीं रखा गया है। लद्दाख की ऐतिहासिक सीमायें यह हैं –

विभाजनकारी बल क्या थे

जहाँ भारत को हमारी संस्कृति और सभ्यता ने एकजुट किया तो वहीं हममें से कुछ की व्यक्तिगत या सामूहिक महत्त्वाकांक्षा ने इसे तोड़ा भी है। किंतु देखे तो भारत से टूटने के बाद भारत की संस्कृति से पूरा विच्छेद होने से ही विभाजन हुआ है।

भारत में कई ऐतिहासिक राज्य हुए हैं। किंतु हिंदू संस्कृति के पालक और अनुयायी होने से वे अलग होकर भी एक बने रहे। तभी सरदार पटेल के आह्वान पर ५०० से अधिक रियासतों ने अपना अस्तित्व खोकर भारत की आधुनिक सीमायें बनाना स्वीकार किया।

वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान और अफगानिस्तान पूर्णतः विभाजित हो चुके हैं क्योंकि उनमें हिंदू संस्कृति पूर्णतः नष्ट हो चुकी है। बांग्लादेश बहुत तेजी से उसी राह पर बढ़ रहा है। तीनों ने हिंदू संस्कृति को नष्ट कर उसे इस्लाम से भरना चाहा और मजहबी आतंक झेल रहे हैं।

अफगानिस्तान, सिंध और पंजाब भारत की पश्चिमी सीमा बनाते थे। इन्हें हराये बिना भारत में प्रवेश असंभव था। अतः यदि आप भारत में मुस्लिम शासन और उसकी भयावहता पढ़ें तो अफगानिस्तान के विभाजन पर थोड़ा भी आश्चर्य नहीं होगा। जब दैनिक जीवन पर इस्लाम का इतना प्रभाव पढ़ने लगता है तो इस्लाम के हाथों अफगान लोगों की संस्कृति का नाश अवश्यंभावी ही लगता है। वहाँ हिंदू प्रभाव के इक्का-दुक्का अंतिम चिह्न भी नष्ट किये जा रहे हैं। आपने शायद वहाँ के एक प्रांत – काफिरिस्तान की कहानी सुनी होगी जिसे आज नूरिस्तान कहते हैं। इस प्रांत के लोग २०वीं शताब्दी तक इस्लाम को अस्वीकार करते आये थे।

भारत-पाकिस्तान विभाजन के विषय में सभी जानते हैं। इसके सबसे बड़े समर्थक थे बरेलवी, अहमदिया और देवबंदी मुसलमान। इस विभाजनकारी आंदोलन का नेतृत्व एक शिया मुसलमान ने किया था। और इससे जुड़े विचार आज भी भारतीय मुसलमानों में पाये जाते हैं। 2018 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय में जिन्ना का चित्र टगा मिला था। इस हिंदू-विरोधी, भारत-विरोधी आंदोलन का ही एक रूप पसमांदा मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव में भी मिलता है।

[चित्र – अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर]

पाकिस्तान से टूट कर बांग्लादेश बनना भी इस हिंदू-विरोध का परिणाम था। अपने निर्माण के समय बांग्लादेश अपनी बंगाली हिंदू संस्कृति को सर्वोच्च रखता था जो पाकिस्तानियों को अस्वीकार था। आज भी कई बांग्लादेशी अपनी बांग्ला पहचान को अपने मजहब के ऊपर रखते हैं। किंतु अब यह बदल रहा है। मोदी जी की बांग्लादेश यात्रा के दौरान मजहबी बांग्लादेशियों द्वारा तोड़े गये मंदिर इसके प्रमाण हैं।

और यही कारण है कि भारत में कई लोग भयाक्रांत हैं कि भूतकाल में भारत का विभाजन करवा चुकी इस्लामी शक्ति के पुनः बढ़ने से भारत कहीं फिर से रक्तरंजित व विभाजित न हो जाये।

अगर किसी को कोई तथ्य गलत लगे तो वह तथ्य के साथ हमे कमेंट कर सकता है, उसे जरूरी होने पर हम परिवर्तन अवश्य करने का प्रयास करेंगे।

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