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मीडिया शोध


शोध


Media sodh(मीडिया शोध):-जो कुछ भी ज्ञात नहीं है अथवा जिसकी अभी तक खोज नहीं की गई है उसे वैज्ञानिक पद्धति के द्वारा ढूंढना अथवा सत्यापित करना शोध कहलाता है। वहीं मीडिया शोध का तात्पर्य उस शोध से है जिसका संबंध मीडिया के किसी क्षेत्र से हो.


शोध का अर्थ है- शंकाओं का निराकरण करना। अंग्रेजी में शोध के लिए Research (रिसर्च) शब्द का प्रयोग किया जाता है। रिसर्च लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है- पुनः खोज। (media sodh)


पी.एम. कुक के शब्दों में- “किसी समस्या के संदर्भ में ईमानदारी, विस्तार तथा बुद्धिमानी से तथ्यों, उनके अर्थ तथा उपयोगिता की खोज करना ही अनुसंधान है।”


शोध में या तो किसी नए तथ्य, सिद्धांत, विधि या वस्तु की खोज की जाती है या फिर प्राचीन तथ्य, सिद्धांत, विधि या वस्तु में परिवर्तन किया जाता है। शोध करते समय पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।पूरी प्रक्रिया की सफलता के लिए एक व्यवस्थित तरीके से गुजरना होता है, इसमें विभिन्न चरणों की क्रमबद्ध व्यवस्था ही शोध का स्वरूप निर्धारण करती है। शोध व्यवस्थित ज्ञान की खोज है।(media sodh)


शोध के क्षेत्र(media sodh)– 


शोध के मुख्य तो दो क्षेत्र होते हैं- साइंस और सोशल साइंस।

साइंस से जुड़े अनुसंधान विज्ञान और तकनीकी से जुड़े शोध होते हैं। यह मुख्यतः प्रायोगिक तरीके से ही किए जाते हैं।सोशल साइंस यानी कि समाज विज्ञान से जुड़े शोध अर्ध-प्रायोगिक होते हैं। समाज विज्ञान के विषयों में राजनीति, समाज, दर्शन, मनोविज्ञान, सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, पुरातात्विक, संचार संबंधी शोध शामिल होते हैं। 

मीडिया शोध(media sodh), समाज विज्ञान शोध का ही अंग है।


शोध(media sodh) के विविध आयाम-


विविध आयाम से मतलब ‘शोध क्यों करना चाहते हैं’, से है यानी कि उसका बेसिक ऑब्जेक्ट क्या है। शोध के दो आयाम माने जाते हैं। 

1) व्यावहारिक आयाम– शोध में जो भी थ्योरी या फार्मूला निकल कर आएगा, उसका व्यवहार में किस तरीके से प्रयोग कर सकते हैं; 

2) सैद्धांतिक आयाम– सिद्धांत निर्माण करना या थ्योरी देना। यानी शोध का प्रयोग किसी सिद्धांत का प्रतिपादन करने के लिए करना।


शोध की सीमाएं


हर शोध की सीमा होती है। सीमा यानी कि वह अंतिम बिंदु जहां तक किसी शोध में पता लगाया जा सकता है। सूट की निम्नलिखित सीमाएं मानी जा सकती हैं- 

●हमेशा एक्यूरेट रिजल्ट नहीं मिलता (खासतौर से सोशल साइंस में) 

●कई विषयों में दायरा सीमित होता है। इसका कारण शोध सामग्री, रिसोर्स हो सकते हैं।   

●समय की पाबंदी   

●सीमित बजट   

●शोध के विषय में रुचि कम होना   

●सेंपलिंग मेथड का ज्ञान नहीं होना   

●समाज में उसका सीमित उपयोग


शोध के प्रेरणा स्रोत-


   ●सामाजिक सेवा    

●व्यावसायिक उपयोग के लिए 

 ●समस्या का समाधान जानने के लिए    

●बौद्धिक आनंद  

 ●अकादमिक प्रोफाइल बनाने के लिए    

●गहन अध्ययन के लिए


शोध के प्रकार- 


1)वर्णनात्मक शोध– यह शोध हमेशा सर्वे मेथड से किया जाता है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य कारण से ज्यादा किसी घटना के प्रभाव को जानना होता है। यह तथ्य जानने पर अधिक जोर देता है।


2)विश्लेषणात्मक शोध- इस शोध में किसी नई व्याख्या को प्रस्तुत किया जाता है। यह नई व्याख्या किसी पुरानी के आधार पर होती है यानी जो कुछ भी एक्जिस्टेंस (existence) में है उसी का रिसर्च करके नई व्याख्या देना।


3)मौलिक शोध– इसमें किसी नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया जाता है। मौलिक शोध को शुद्ध शोध( Pure research) सैद्धांतिक शोध, बेसिक रिसर्च, फंडामेंटल रिसर्च के नाम से भी जाना जाता है।


4)एप्लाइड रिसर्च (Applied Research)-  जब किसी पुरानी थ्योरी को आधार मानते हुए रिसर्च किया जाता है तो यह अप्लाइड रिसर्च कहलाता है। इसमें किसी पुरानी थ्योरी को अप्लाई किया जाता है और एक नई थ्योरी दी जाती है।


5)गुणात्मक रिसर्च– व्यावहारिक विज्ञान की रिसर्च गुणात्मक रिसर्च ही होती है। इसमें क्या,क्यों,कैसे से जुड़े प्रश्नों के जवाब तलाश किए जाते हैं। यह क्वालिटेटिव होती है। 


6)संख्यात्मक रिसर्च- इसमें संख्या की खोज की जाती है। संख्यात्मक रिजल्ट से निकलने वाला परिणाम परसेंटेज में होता है और वह एक संख्या होती है यानी कि क्वांटिटेटिव।


7)प्रयोगात्मक शोध- यह विज्ञान आधारित रिसर्च है। इसे लैब में संपन्न किया जाता है। इसमें चर यानी वेरिएबल को कंट्रोल किया जा सकता है। रिसर्च के बाद किसी घटना के घटित होने के कारणों का पता किया जाता है।
8)वन टाइम रिसर्च- ऐसीे रिसर्च जिसे केवल एक बार किया जाए। उदाहरण पीएचडी रिसर्च।


9)कंपैरेटिव रिसर्च( तुलनात्मक)- इसमें दो चरों के मध्य संबंधों का पता लगाने का प्रयास किया जाता है।


10)ऐतिहासिक शोध- इस शोध में इतिहास से जुड़े विषय लिए जाते हैं। ऐतिहासिक शोध में लिया जाने वाला डाटा सेकेंडरी होता है। इसमें पूर्व की घटनाओं का अध्ययन करके कुछ नया पता लगाने की कोशिश की जाती है।


11)लोंगिट्यूडनल रिसर्च(अनुदैर्ध्य या Longitudinal)- इस तरह की रिसर्च एक निश्चित अंतराल पर बार-बार की जाती है। इसमें चलो की संख्या समान होनी चाहिए। इस तरह के शोध में डिफरेंस यानी कि अंतर जानने का प्रयास किया जाता है। उदाहरण-जनगणना।


12)एक्सप्लोरेट्री रिसर्च ( अन्वेषणात्मक रिजल्ट)- इस प्रकार की रिसर्च में हमेशा कुछ नया एक्स्प्लोर किया जाता है इसलिए इसमें हाइपोथेसिस नहीं बनाई जाती है। जब किसी विषय की जानकारी शोधार्थी को नहीं होती है तब यह शोध किया जाता है। यह एक निश्चित उद्देश्य पर काम करता है। 

सर्वेक्षण की विधियां


   ●प्रश्नावली तैयार करके    ●टेलीफोन से    ●मेल से    ●डोर टू डोर    ●इंटरव्यू    ●शेड्यूल मेथड    ●पायलट मेथड


सैंपलिंग की विधियां-


‘जनसंख्या का वह छोटा हिस्सा जो पूरी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है नमूना (सैंपल) कहलाता है।’


   नमूना विधि के लाभ–  समय की बचत, धन की बचत, सटीक परिणाम, कम इकाई गहन अध्ययन।


   नमूना विधि की सीमाएं- पूर्वाग्रह की संभावना, प्रतिनिधि नमूना चुनने में कठिनाई, अपर्याप्त-भौगोलिक क्षेत्र की विविधता।


   नमूना इकाई चुनने की प्रक्रिया– सबसे पहले यूनिवर्स का निर्धारण करना, फिर नमूना इकाई सुनिश्चित करना, उसके बाद स्रोत सूची तैयार करना, बेहतर नमूने का संभावित आकार तैयार करना, फिर प्रतिनिधि नमूने की परख करना और नमूने की विश्वसनीयता की जांच करना।

शोधकर्ता के उत्तरदायित्व- 


  ●शोधार्थी में ईमानदारी हो  

●शोध के परिणाम के प्रति कोई पूर्वाग्रह ना हो  

●गोपनीयता रखे 

●जिम्मेदार प्रकाशन व मार्गदर्शन  

●शोध की सामाजिक जिम्मेदारी समझे 

●रिसर्च के बाहरी हस्तक्षेप से बचे 

●शोधकर्ता अपने विषय से भटके नहीं  

●शोधकर्ता अपने शोध के विषय की प्रासंगिकता को सिद्ध कर पाए 

●शोधकर्ता सही सैंपल मेथड का चयन करे 

●शोध की आगामी संभावनाएं बताए  

◆सही संदर्भ लेखन करे


शोध के उपकरण(media sodh)- 

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