लैंगिक असमानता यानी लैंगिक आधार पर भेदभाव। अर्थात लैंगिक आधार पर किया जाने वाला भेदभाव जिसमे एक वर्ग (महिलाओं) को कमजोर वर्ग के रूप में देखा और जाना जाता है। और ये (महिलाएं) घर और समाज दोनों जगहों पर शोषण, अपमान और भेदभाव से पीड़ित किये जाते रहे हैं। विशेषकर परंपरागत रूप से कहें तो लैंगिक असमानता के रूप में महिलाओं के खिलाफ़ भेदभाव और उनके वर्ग को कमजोर समझा जाता रहा है।

भारत के संदर्भ में कहें तो लैंगिक असमानता को समझना आज भी पारदर्शी की तरह है। बेशक आज हम 21वीं शताब्दी में हैं और जिसका हमें गर्व होना चाहिए कि हमने भारत में जन्म लिया, पर आज भी समाज में जो एक बेटा पैदा होने पर खुशी का जश्न मनाया जाता है वो बेटी के जन्म होने पर शांत हो जाता है जिसे एक नियम मान लिया गया है(अब इसमें परिवर्तन हो रहा है पर नाम का)।वहीं इतिहास को देखें तो प्राचीनकाल से ही यह सुनने को मिलता आरहा है कि लड़की के जन्म होने से पहले ही उसकी भ्रूण हत्या कर दी जाती है और जो इससे बच जाते हैं उन्हें जीवनभर भेदभाव का सामना कर उसका मोल चुकाना पड़ता है।

भारत में लैंगिक भेदभाव की जड़े कितनी मजबूत और गहरी है इसको इस आंकड़े से समझ सकते हैं कि भारत वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट,2020 के अनुसार 153 देशों में भारत का स्थान 112 पर है। वहीं स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविका के क्षेत्र में भारत का स्थान 150 वें पर है। जबकि भारत के मुकाबले देखें तो हमारे पड़ोसी देशों का प्रदर्शन अच्छा रहा है, जिसमें बांग्लादेश 50 वें स्थान पर, नेपाल 101 वें स्थान पर, श्रीलंका 102 वें स्थान पर, इंडोनेशिया 85 वें स्थान और चीन 106 वें स्थान पर हैं।जिसे देख कर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि भारत मे लैंगिक समानता का अभाव कितना है।

अब भारत में लैंगिक असमानता की समस्या या कारण को समझने का प्रयास करें तो हम देखते हैं कि पहला तो भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति होने के बावजूद भी समाज की पितृसत्ता की मानसिकता को और उसके जटिलता को को बदलने में प्रभावहीन रहा है।जिसके चलते महिलाएं आज के आधुनिक युग में भी समाज में एक जिम्मेदारी के रूप देखी जाती हैं और सामाजिक और पारिवारिक रूढियों के कारण विकास के नाम मात्र अवसर ही बिरले मिलते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व को दबाकर उनके विकास को पूर्ण रूप से रोकने का प्रयास किया जाता है।इसके उदारहरण के रूप में देखें तो सबरीमाला और तीन तलाक़ जैसे मुद्दे सामाजिक मतभेद और पितृसत्ता के मानसिकता को प्रतिबिंबित करते हैं।दूसरा भारत में आज भी देखें तो जमीनी स्तर पर आज भी पारिवारिक संपत्ति पर महिलाओं का अधिकार प्रचलन में नहीं है जिसके कारण उनके साथ विद्रोही जैसा व्यवहार किया जाता रहा है पर 2014 के सुप्रीम कोर्ट के महिलाओं के संपत्ति पर अधिकार दिए जाने पर इस संदर्भ में कुछ सुधार हुए हैं,पर ऐसा सुनने को मिल रहा है कि इसके कारण महिलाओं की भ्रूण हत्या में और वृद्धि हो गयी है। तीसरा कारण महिलाओं के रोजगार को अंडर रिपोर्टिंग करना है। जिसका सीधा अर्थ यह है कि जो महिलाएं, परिवार के खेतों में, उद्यमो में तथा घर में कार्य कर रही हैं उन्हें अवैतनिक कार्यो की श्रेणी में रखा जाएगा और जिसको सकल घरेलू उत्पाद में नहीं जोड़ कर कम आंका जाएंगे जो कि महिलाओं पर सीधा हमला है। चौथा शैक्षिक कारक जैसे मानकों पर महिलाओं की स्थिति पुरुषों की अपेक्षा कमजोर होना है। हालांकि लड़कियों के शैक्षणिक नामांकन में पिछले दो दशकों में वृद्धि हुई है तथा माध्यमिक शिक्षा तक लैंगिक समानता के आंकड़े की स्थित भी सही है लेकिन अभी-भी उच्च शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं के नामांकन को देखें तो वह पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम हैं। जिसका मुख्य कारण तो यह है कि भारत मे आज भी ज्यादातर वर्ग उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा को तवज्जो न देकर उन्हें शादी और अन्य घर वाले कार्यक्रम में घुलना देखना चाहते हैं और इसके साथ उनको यह डर होता है कि ज्यादा पड़ कर कही समाज का नाम न खराब कर दे। जो कि एक गलत धारणा है।

लैंगिक असमानता के समाधान की बात करें तो भारत इस क्षेत्र में बहुत ध्यान दे रहा है जिसमें पहला तो भारत में समाज की मानसिकता में अब धीरे-धीरे सुधार आ रहा है जिसके चलते आज महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर गंभीरता से विमर्श किया जा रहा है।उदाहरण के लिए तीन तलाक़, हाजी अली दरगाह में प्रवेश जैसे मुद्दे पर सरकार तथा न्यायालय की सक्रियता के कारण महिलाओं को उनका अधिकार प्रदान किया जा रहा है।पर अब भी इनमें और सुधार होने आवश्यक है।दूसरा देखे तो आज राजनीतिक प्रतिभाग के क्षेत्र में भारत लगातार अच्छा प्रयास कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2020 में राजनीतिक सशक्तिकरण और भागीदारी मानक पर अन्य बिंदुओं की अपेक्षा भारत का 18 वाँ स्थान है। वहीं आज सरकार महिलाओं के लिए ” बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ”, “वन स्टॉप सेंटर योजना”, “महिला हेल्पलाइन योजना”, और “महिला शक्ति केंद्र” जैसी योजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तिकरण का प्रयास किया जा रहा है। इन योजनाओं के क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप लिंगानुपात और लड़कियों के शैक्षणिक नामांकन में प्रगति देखी जा रही है और, आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हेतु मुद्रा और अन्य महिला केंद्रित योजनाएं भी चलाई जा रही हैं।

इसके अलावा लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए कानूनी प्रावधानों के अलावा महिला असमानता के समाधान के लिए बजट में महिला सशक्तिकरण तथा शिशु कल्याण के लिए धन आवंटन का उल्लेख किया जा रहा है जिसे जेंडर बजट का नाम दिया गया है। इसके माध्यम से राजकोषीय नीतियों में लिंग संबंधी चिंताओं का समाधान करना है। जिसे 2005 में भारत ने लैंगिक समानता के समाधान के लिए औपचारिक रूप से वित्तीय बजट में शामिल किया गया है। जिसके माध्यम से महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभार्थी बनाने के बजाय उन्हें विकास यात्रा में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनाना है। हालांकि , जेंडर बजटिंग लैंगिक असमानता को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है लेकिन इसके लिए जीआरबी के माध्यम से नीतियों को और अधिक प्रभावी और व्यापक बनाना होगा या फिर सीधे सीधे कहें तो वास्तविक सुधारों के लिए जेंडर बजटिंग को, महिलाओं के आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता से जोड़ना होगा ताकि इसका लाभ इन्हें खुद से मिल सके।

उपरोक्त कथन के अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि महिलाओं को इतिहास से लेकर आज 21वीं शताब्दी तक प्रताणना का सामना करना पड़ रहा है बेशक आज सबके विचार परिवर्तनशील धीरे धीरे हो रहे हैं। सब महिलाओं के स्थिति को अच्छी करने में लगे हैं पर आज भी प्रताणित महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा है । जिसको केवल कानून ला देने से नही सही किया जा सकता वरन इसके लिए समाज मे एक नवयुग का लाना आवश्यक है जिसे स्वयं समाज ही ले सकता है।

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